Sunday, 24 May 2026

और अंत में वर्षों की यादें, संघर्ष, हँसी, अधूरी बातें और अपनापन…सब मिलकर आँसू बन जाना चाहते हैं....

कभी-कभी जीवन में कुछ रिश्ते बिना किसी औपचारिक नाम के भी परिवार बन जाते हैं। एक रूममेट… जो शुरुआत में बस “कमरा शेयर करने वाला लड़का” होता है, धीरे-धीरे आपकी रोज़मर्रा की जिंदगी का सबसे स्थायी हिस्सा बन जाता है। 6-7 साल…ये सिर्फ समय नहीं होता, ये एक पूरा युग होता है।

इन वर्षों में कितनी चीजें साथ बदलती हैं ...कमरे बदलते हैं, शहर बदलते हैं, सपने बदलते हैं, संघर्ष बदलते हैं…पर अगर कुछ स्थिर रहता है, तो वह होता है उस कमरे का दूसरा बिस्तर, जिस पर बैठा इंसान हर हार और हर उम्मीद का गवाह होता है। वह जानता है कि किस परीक्षा के बाद तुम पूरी रात चुप रहे थे। उसे याद है कि किस रिज़ल्ट के बाद तुमने बिना कुछ कहे बस छत को घूरा था। वह यह भी जानता है कि किस दिन तुम्हारी आँखों में पहली बार भरोसा लौटा था।

एक रूममेट सिर्फ साथ रहने वाला व्यक्ति नहीं होता,वह तुम्हारे संघर्षों का अनौपचारिक इतिहासकार होता है।और आज…जब उसके चयन की खबर आई, joining की तारीख तय हुई, तो खुशी तो हुई… बहुत हुई…लेकिन उस खुशी के पीछे एक अजीब-सी खाली जगह भी महसूस हुई। जैसे जिंदगी का कोई अध्याय पूरा हो रहा हो।


सोचता हूँ…अब वह बिस्तर खाली रहेगा। रात में अचानक किसी करंट अफेयर्स या दुनिया जहान की बहस नहीं होगी। “त्रिपाठी चाय पीने चलें?” जैसी आवाज़ें धीरे-धीरे यादों में बदल जाएँगी। सुबह की काली मिर्च वाली काली चाय ...अब बस एक याद सरीखा जेहन में बना रहेगा । कमरे में वही सब सामान होगा, लेकिन वह “अपनापन” शायद नहीं रहेगा।

हम अक्सर सफलता की बातें करते हैं, लेकिन सफलता के साथ आने वाली विदाइयों के बारे में कोई नहीं बताता। कोई यह नहीं बताता कि जिस दोस्त के साथ बैठकर नौकरी के सपने देखे थे,उसके सच हो जाने खुशी पर ये विदाई  ...दिल पर इतना भारी भी हो सकता है। शायद इसलिए विदा करना इतना कठिन होता है ...क्योंकि कुछ लोग हमारे जीवन में आदत बन जाते हैं। 

और अंत में…ढेर सारी भावनाएँ चुपचाप आँखों तक आकर ठहर जाती हैं। मन बहुत कुछ कहना चाहता है,पर शब्द कहीं पीछे छूट जाते हैं। बस ऐसा लगता है जैसे भीतर जमा वर्षों की यादें, संघर्ष, हँसी, अधूरी बातें और अपनापन…सब मिलकर आँसू बन जाना चाहते हों.....

~दीपक 

Monday, 4 May 2026

मम्मा’ज़ बॉय...

कई लोग “मम्मा’ज़ बॉय” सुनते ही मुस्कुरा देते हैं, जैसे कोई हल्का-फुल्का मज़ाक हो। लेकिन मुझे लगता है कि अगर किसी लड़के को उसकी माँ ने इस कदर प्यार, समझ और संस्कार दिए हैं कि वह ज़िंदगी भर उससे जुड़ा रहता है… तो इससे बड़ी ताकत और क्या हो सकती है?
एक “मम्मा’ज़ बॉय” अपनी माँ की इज़्ज़त करता है, उसकी भावनाओं को समझता है। वह जानता है कि उसकी हर छोटी-बड़ी खुशी के पीछे उसकी माँ की अनगिनत कुर्बानियाँ छुपी हैं। इसलिए वह कभी भी उसे नजरअंदाज नहीं कर सकता।
मैं उन लोगों में से हूँ जो अपनी मम्मी से रोज़ कम से कम एक बार बात ज़रूर करते हैं। और मै किसी वजह से न कर पाया तो शाम तक मम्मी का फोन आ जाता है ।  मेरा छोटा भाई मजाक मजाक में अक्सर कहता है ...“लो आ गया माता जी के प्रिय पुत्र का फोन !”
अब ये कॉल सिर्फ “खाना खाया?” तक सीमित नहीं रहती… मेरी मम्मी मेरे लिए एकदम “परिवारिक सूचना केंद्र” जैसी हैं।
आस पड़ोस किसकी तबीयत कैसी है, बहनों और मामा के घर क्या नया हुआ, पड़ोस में किसकी शादी तय हो गई (विशेषरूप से).....पापा के किस गलती पर आज मम्मी को गुस्सा आई , छोटा भाई और भांजी आजकल कितनी देर देर तक मोबाइल चला रहे हैं 😄 आदि आदि ... .सारी अपडेट्स सबसे पहले वहीं से मिलती हैं। 
और मज़े की बात ये है कि कभी-कभी हमारी बातें घर-परिवार से निकलकर सीधे देश-विदेश तक पहुँच जाती हैं।
"क्या मोदी जी भी मछली खाने लगे हैं 😀"
“आजकल गैस के दाम इतने क्यों बढ़ रहे हैं?”
“ये ट्रंप लड़ाई झगड़ा क्यूँ कर रहा है ?” आदि आदि ...

लेकिन इस हँसी-मज़ाक के पीछे एक गहरी बात भी है…
माँ के साथ ये जुड़ाव सिर्फ बातों तक सीमित नहीं रहता, ये मेरे व्यवहार को भी प्रभावित करता है। शायद यही वजह है कि मैं हर महिला, खासकर लड़कियों के प्रति थोड़ा ज्यादा संवेदनशील रहता हूँ। उनकी बातों को सुनना, उनकी भावनाओं को समझना, उनकी इज़्ज़त करना... ये सब मैंने कहीं बाहर से नहीं सीखा, ये सब तो मम्मी ने ही सिखाया है।

तो हाँ…
मैं “मम्मा’ज़ बॉय” हूँ।
क्योंकि दिन के अंत में, ये “मम्मा’ज़ बॉय” होना ही है…
जो मुझे थोड़ा इमोशनल बनाता है, थोड़ा समझदार… और मेरे अंदर थोड़ा-सा बचपन जिंदा रखे रहता है | 
~दीपक


Monday, 13 April 2026

आपकी मानसिक शांति और आत्मसम्मान, किसी भी दोस्ती से ज्यादा कीमती है...

दोस्ती और रिश्ते हमारे जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। ये हमें सहारा देते हैं, हमें समझते हैं और हमारे जीवन को खूबसूरत बनाते हैं। लेकिन हर रिश्ता तभी तक अच्छा है, जब तक उसमें सम्मान, समझ और सकारात्मकता बनी रहती है।

मेरे लिए किसी को अपनी “अच्छे दोस्तों” की सूची में रखना या नहीं रखना, यह पूरी तरह उसके व्यवहार पर निर्भर करता है। हर इंसान में अच्छाई और बुराई दोनों होती हैं...यह मानव स्वभाव है। लेकिन असली फर्क इस बात से पड़ता है कि कोई व्यक्ति आपकी किन बातों पर ध्यान देता है।
अगर कोई आपकी अच्छाइयों को नजरअंदाज करके केवल आपकी कमियों को गिनता है,पीठ पीछे बुराई करता है,बार-बार आपको नीचा दिखाने की कोशिश करता है, तो यह संकेत है कि वह दोस्ती आपके मानसिक संतुलन के लिए सही नहीं है। 

ऐसा नहीं है एक दोस्त को हमेशा आपमें अच्छाई ही दिखनी चाहिए । कुछ गलत है तो उसको कहना भी जरूरी है लेकिन लहजा मायने रखता है ।

खुद की शांति, आत्मसम्मान और मानसिक संतुलन किसी भी दोस्ती या रिश्ते से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। जो लोग आपको समझते हैं, आपकी कद्र करते हैं और आपकी अच्छाइयों को पहचानते हैं, वही आपके सच्चे साथी होते हैं।
बाकी लोगों से दूरी बना लेना कमजोरी नहीं, बल्कि खुद के प्रति आपकी समझदारी और सम्मान को दर्शाता है।
क्योंकि “आपकी मानसिक शांति और आत्मसम्मान, किसी भी दोस्ती से ज्यादा कीमती है।” 
~दीपक

Thursday, 12 February 2026

मै कई दिनों से एक आसमान ढूंढ रहा हूं....

मेरे सीने में, नहीं दिल के कोने में, नहीं नहीं पूरे जेहन में कुछ भारी सा अटका हुआ है । मैं कई दिनों से सोच रहा हूं कि उसे खुरच के दूर फेंक दूं । लेकिन वह दिनों दिन भारी होता जा रहा है । मै कई दिनों से एक आसमान ढूंढ रहा हूं जहां मैं जी भर के चिल्ला सकूं और कोई मुझसे वजह न पूछे । कई दिनों से याद कर रहा लेकिन रोना भूलने की वजह से मैं डूबता जा रहा हूं । कलम से कागजों पर अक्षर की जगह एक तस्वीर बनाना चाहता हूं । एक ऐसी तस्वीर जो मुझसे बातें करते समय सिर्फ मेरी बुराइयां न गिनाए । बुराइयां हर किसी में होती है । ये बात मुझे दुनिया ने पहले ही बता रखा है । 

~दीपक







Monday, 2 February 2026

मेरे आंखों के कोर में एक झील उभर आती है ..

तुम मुझे याद आते हो और याद आते रहोगे । सिर्फ इसलिए नहीं कि तुमने एक अरसे तक मेरा ख्याल रखा, मेरी छोटी छोटी जरूरतों को अपने लिए जरूरी मान लिया, मेरी आहट को पहचानने का हुनर सीख लिया । बल्कि इसलिए कि तुम्हारे प्यार ने मेरे अंदर एक अलग इंसान को शक्ल दे दिया । 

लोग कहते हैं मै बाहर से बहुत मजबूत और हँसमुख दिखता हूं । लेकिन जब मेरे अंदर का इंसान बाहरी इंसान पर हावी होता है तो  रात के अंधेरे में मेरे आंखों के कोर में एक झील उभर आती है । मुझे उस झील में तैरती ढेर सारी रंगीन तस्वीरें दिखनी लगती हैं। कभी वो पहली बार साथ देखा बर्फ का पहाड़ दिखता है, कभी नदी की तली में बहता वो पारदर्शी पानी । कभी किसी पहाड़ी फूल से तुम्हारी महक आने लगती है तो कभी किसी सुनसान रस्ते के पेड़ हमारे किस्सों के गवाह बन जाते हैं । 

मुझे पता है मैं तुम्हारे हिस्से का प्यार तुम्हें उस कदर लौटा नहीं पाया । लेकिन तुम्हारे साथ बिताए उन ढेर सारे पलों को किसी डायरी के पन्नों और आंसुओं भर में समेट भी नहीं पाया । 

~दीपक 

Monday, 26 January 2026

मैं फिर अकेला और खाली हो जाता हूं ...

मैं एक छोर पर खड़ा देखता रह जाता हूं । लोग आगे बढ़ जाते हैं । मैं पुराने दिनों को जीने के खयाल से तेज कदम से साथ चलने की कोशिशें करता हूं । लेकिन बराबर पहुंचने पर वे लोग मुझे पहचानने से इनकार कर देते हैं । 

मेरा एक मन करता है मै ठिठक जाऊं.... जो जा रहा है उसे जाने दूं ...लेकिन एक दूसरा मन...मुझे विवश करता है । मैं अपनी पहचान याद दिलाने की ढेरों कोशिशों में जुट जाता हूं । इस बार ऐसा लगता है कि सामने वाले ने मुझे पहचान लिया है ...वह थोड़ी देर रुकता भी है । लेकिन बात करते हुए मुझे  ऐसा लगता है सामने वाला सच में मुझे पहचान नहीं पाया है वह बस संवेदना के लिए रुका है । शायद उसे मुझ पर दया आ गई थी ...और ढेर सारी बातों के बाद मैं फिर अकेला और खाली हो जाता हूं ।

~दीपक

Saturday, 13 December 2025

बचपन की साथी ..जीवन में मेरी शिक्षक

कभी-कभी कुछ गहरे भावनात्मक क्षणों में दिल में भरा ढेर सारा प्रेम, बिना आवाज़ किए, धीरे-धीरे आसूं बन जाना चाहता है।
 दीदी मुझसे उम्र में बस थोड़ी सी बड़ी हैं...पर जीवन के हर मोड़ पर उन्होंने मुझसे पहले कदम रखा। 
पहले अक्षर पहचाने, पहले पेंसिल सही पकड़ी, पहियों पर संतुलन बनाना भी मुझसे पहले उन्होंने ही सीखा ;चाहे वो A B C D हो या साइकिल का हैंडल पकड़कर पूरा जीवन चलाने का हुनर।

बचपन में हम दोनों के बीच काम बँटे थे —स्कूल जाते समय टिफ़िन दीदी ले जातीं, और वापसी में खाली टिफ़िन ढोना मेरे हिस्से आता।जाते समय कभी टिफ़िन खोया नहीं,पर लौटते समय मैं अक्सर टिफिन खो जाता…लेकिन हर बार दीदी की नज़र में शिकायत कम, जिम्मेदारी ज़्यादा दिखती। शायद उसी दिन से उन्होंने घर की, रिश्तों की, और मुझ जैसे छोटे से दुनिया की जिम्मेदारी अपने कंधों पर रख ली थी।

आज भी जब देखता हूँ उन्हें ....रिश्ते निभाते,सैकड़ों काम करते ,सबके बीच मुस्कान बाँटते हुए, खुद की थकान चार दीवारों में बंद करके,बीच-बीच में औरों के जीवन के लिए, सपनों के लिए वक्त निकालती हुई —तो मन कह उठता है…दीदी तो आज भी सीखने की, आगे बढ़ने की दौड़ में सबसे आगे ही हैं। बचपन की साथी आज भी जीवन में मेरी शिक्षक है —चाहे वो शब्दों की हो… भावनाओं की, या मजबूत बनने की।
~दीपक

मजबूरी जब घुटन बन जाती है...

मजबूर होना बहुत परेशान करता है।
और जब सामने कोई उसी मजबूरी का फायदा उठाने लगे,
और आप चाहकर भी कुछ न कर पाएं,
तो वही परेशानी धीरे-धीरे घुटन में बदल जाती है।
मन भारी हो जाता है,
और खामोशी अंदर ही अंदर शोर मचाने लगती है।

सबसे ज़्यादा तकलीफ़ तब होती है
जब इंसान दूसरों से नहीं,
खुद से चिढ़ने लगता है।
मन बार-बार सवाल करता है...
“अब तक ऐसा मुकाम क्यों हासिल नहीं कर पाया
कि अपनों का सहारा बन पाता?”

यह सवाल किसी और के ताने से ज़्यादा चुभता है।
क्योंकि इसमें उम्मीद भी होती है
और खुद से नाराज़गी भी।
लगता है जैसे मेहनत अधूरी रह गई हो,
जैसे सपने रास्ते में ही थक गए हों...

~दीपक

Friday, 28 November 2025

अनकही मोहब्बत : एक अधूरी सी कहानी




लखनऊ की हल्की सर्द हवा उस रात कुछ ज़्यादा ही चुभ रही थी।
दो लोग—जो एक-दूसरे से दूर हो चुके थे... अचानक बातों में उतर आए।और यह बातचीत वही पुरानी यादों का दरवाज़ा खोल बैठी,जिसे दोनों ने बहुत कोशिशों के बाद बंद किया था।
महीनों की दूरी के बाद अचानक मैसेज आया—
एक सीधा-सा शब्द:
“Missing you…badly ”
और उसी पल दोनों की सारी मज़बूतियाँ ढह गईं।

लड़के ने मान लिया था कि उस रिश्ते को अब वापस नहीं होना—लेकिन एक मैसेज ने सालों की इच्छाओं, शिकायतों,
और आधे-अधूरे सपनों को फिर से जिंदा कर दिया।

वह लड़का लिखता गया—
“मै भी आज तक तुम्हे भूल नहीं … मै भी नहीं चाहता था कि तुम इस तरह से दूर चले जाओ…तुम खुश रहो…बस यही चाहता हूँ।”
पर उसकी उंगलियाँ काँप रहीं थीं।

और लड़की धीमे से जवाब देती—
दूर तो मैं आज भी नहीं हूँ… पर पास रह भी नहीं पाती।”

दोनों खूब हँसे, खूब छेड़ा एक-दूसरे को…लेकिन हर लाइन के पीछे एक हल्की-सी टीस छुपी थी,एक ऐसा सच जिसे दोनों जानते थे—कि ये रिश्ता दोस्ती भी नहीं बन सकता…और प्यार के नाम पर निभ भी नहीं सकता।

लड़की बार-बार कहती—
मैं तुम्हें सिर्फ़ दोस्त बनकर नहीं देख पाऊँगी। तुमसे मिलूँगी तो दिल फिर वही महसूस करेगा…और फिर वही तकलीफ़ होगी।”

लड़के ने भी दिल की बात खोल दी—
मैं तो बस इतना चाहता हूँ कि तुम मेरी ज़िंदगी से पूरी तरह गायब न हो जाओ। कभी-कभी एक संदेश भेज देना… बस इतना काफ़ी है।”

फिर दोनों ने अपने सपने सुनाए—वो सपने जो कभी पूरे नहीं होने वाले थे।

लड़की ने हँसते हुए बताया—
मैंने सपना देखा था कि तुम्हें कोई बड़ा पुरस्कार मिल रहा है,
और तुम स्टेज पर सबके सामने मेरी तारीफ़ कर रहे हो…
और मैं रो रही हूँ।”

लड़का भी मुस्कुराया—“मैंने भी सपना देखा था…तुम उस मेरी फेवरेट सारी में मेरे सामने आती हो,पहले थप्पड़ मारती हो,फिर कसकर गले लगा लेती हो…और हम दोनों रो पड़ते हैं।”

इन सपनों में जितनी हँसी थी,उतना ही दर्द भी छिपा हुआ था।
बातों-बातों में पुराने ग़लतफ़हमियाँ भी सामने आईं—
“तुमने मुझे वक़्त नहीं दिया…”
“तुमने भरोसा नहीं किया…”
“किसी तीसरे ने हमारे बीच जगह बना ली…”
“मुझे लगता था तुम भी धोखा दोगी…”

दोनों अपनी-अपनी लड़ाई लड़ते रहे,
और कभी एक-दूसरे के साथ खड़े ही न हो पाए।फिर आई वह पंक्ति…जो दोनों के दिल में चुभी—
चलो, इसे अनकहा ही रहने देते हैं…नाम मत दो इस रिश्ते को।”

और फिर हँसी-मज़ाक की कुछ हल्की बातें—
शादी, फोटो, रिजेक्शन, सपने, सरप्राइज़…
सब एक प्यारी कोशिश थी दिल की भारी रात को हल्का करने की।अंत में लड़का धीरे से बोला—
कभी ज़्यादा प्यार आए…तो एक आख़िरी बार समय निकालकर मिल लेना।”

लड़की ने बस “हम्म…” कहा—
एक छोटा-सा जवाब,
जिसमें हजारों भाव छुपे थे।

रात खत्म हुई…दोनों ने “Good night” लिखा—
और अपने-अपने कमरे की चुप्पी में जा सोए।
लेकिन उस रात…

दोनों जानते थे कि
कहानी खत्म नहीं हुई—
बस अनकही रह गई।


~दीपक

Friday, 31 October 2025

अंधेरे का कैनवास

मै बहुत देर तक उस अंधेरे में नहीं रह पाता । मै अनंत तक सोच पाने को एक छोर ढूंढ लेता हूं । जैसे रात का अंधेरा नींद आते ही एक कैनवास बन जाता है और उस पर वो सारे चित्र उग आते हैं जिनसे मै उजाले में दूर भागता रहता हूं । मै अंधेरे से ज्यादा डरता हूं या अकेलेपन से; यह मै आज तक ठीक ठीक समझ नहीं पाया । कभी कभी मुझे सपने में एक फीके रंग की दुनिया दिखती है जिसमें रंगीन तितलियां इंसानों को देखकर भागती नहीं है । वो आपस में खूब बातें करते हैं । इंसान ढेर सारे फूल लगाकर तितलियों को संदेशा भेजते है । तितलियां दूर देश से आती है। तितलियां और इंसान जब साथ हंसते हैं तो एक नया संगीन सुनाई देता है । अंत में तितलियां इंसानों के साथ हमेशा के लिए बस जाती हैं और वह फीकी दुनिया एकाएक रंगीन हो जाती है । 

~दीपक

Sunday, 14 September 2025

उसका नाम, उसका चेहरा, और उसकी अंदरूनी महक

और कुछ है जो वापस लौट आता है । हर बार कोई नया रूप धरकर । कभी उसके शहर में न रहते हुए भी; और उसके शहर में पहुंचने के बाद तो क्या ही कहने । मुझे कभी कभी लगता है उसका नाम, उसका चेहरा, और उसकी अंदरूनी महक; मेरे शरीर के भीतर कहीं चिपक गई है । वह पल अपने पूरे वजूद के साथ उभर आता हैं जब हम एक दूसरे की महक में डूबे पूरे के पूरे दिन और शामें गुजार देते थे । ऐसे दौर में कुछ अतीत के दिन जिंदा शक्ल लिए आस पास भटकने लगते है । 
मैं बकार्डी के चार पैग लगा कर एक बढ़िया माहौल के साथ वूफर पर बज रहे ग़ज़ल का आनंद ले रहा था । खिड़की के बाहर हल्की बारिश से हवाएं छन-छनकर माहौल में एक अजीब सी रोमानियत घोल रही थीं। डोर वेल बजा । मैंने गुनगुनाते हुए दरवाजा खोला। सुबह सुबह खिल आए एक फूल सी ताजगी लिए अगले पल वो मेरी बाहों में थी । एक अजीब से आकर्षण ने हमारे होठों को आपस में बांध दिया था । थोड़ी ही देर में उसकी अंदरूनी महक ने मुझे अपने कब्जे में ले लिया था । लैटिन अमेरिकी रम के नशे पर एक दूसरा नशा भारी पड़ रहा था । जितनी भी चीजें हमारे बीच थी धीरे धीरे करके दूर होती गई । मैने अपने आपको उसके बाहों के बीच निढाल छोड़ दिया । 
हम एक दूसरे में खोए रहे । बैकग्राउंड में संगीत बजता रहा । उन कई घंटों में मेरे लिए दुनिया उसके आलिंगन में सिमट गई थी । उसकी महक के साथ साथ उसके शरीर की गर्मी; मै बहुत अंदर तक महसूस कर रहा था । उसके होठों की लालिमा मेरे होठों में उतर आई थी ।उस दिन ज्यादा बातें नहीं हुई ।
शाम ढल आई । उसके वापस लौट जाने का वक्त आ गया । न मै उसे जाने देने चाहता था और न वह जाना चाहती थी । हम दोनों उस रोज दुनिया भर की घड़ियां को रोक देना चाहते थे । लेकिन वक्त रुका नहीं ...उसे जाना ही पड़ा । लेकिन जाते जाते मेरे अंदरूनी हिस्से में कुछ ऐसा छोड़ दिया जो एक मीठे दर्द के रूप में आज भी यदा कदा उभर ही आता है ।
~दीपक

Saturday, 23 August 2025

"कॉफ़ी, बारिश और वो"

अकेला मैं… हाथ में एक स्ट्रॉन्ग कॉफ़ी का कप। बालकनी से झरती हल्की-हल्की बूंदें जैसे किसी पुरानी याद को ताज़ा कर रही थीं। गमलों में लगे पौधों की पत्तियाँ हर बूँद के साथ चमक उठतीं, और मैं उस चमक में अतीत की परछाइयाँ ढूँढने लगता।

पीछे धीमी आवाज़ में जगजीत सिंह की ग़ज़ल बज रही थी— "होशवालों को खबर क्या..."और तभी, उस नमी भरी हवा में एक ख़ुशबू घुल गई।

मैंने मुड़कर देखा...वो खड़ी थी, भीगी हुई साड़ी में, आँखों में वही चमक और शरारत जो कभी लखनऊ के इको पार्क में घूमते हुए उसकी आंखों में दिखाई देती थी ।

“तुम यहाँ? इतने साल बाद…?”

उसने मुस्कुराकर कहा...“कॉफ़ी अब भी स्ट्रॉन्ग ही बनाते हो… या बदल गए हो?”

मैं कुछ बोलता, उससे पहले ही उसने आगे बढ़कर मेरे हाथ से कप ले लिया। एक घूंट लिया और बालकनी की रेलिंग पर झुक गई। बारिश की बूंदें उसके बालों से फिसलकर उसकी गर्दन पर ठहर जातीं, और मैं बस उसे देखता रह गया। ग़ज़ल की आवाज़, बारिश की बूंदें और उसकी ख़ामोशी ... सब मिलकर एक अधूरी मोहब्बत की दास्तान कह रहे थे।

मैंने हिम्मत जुटाकर कहा...“तुमसे कितनी बार मिलने को कहा...तुम कभी मिले क्यों नहीं?”उसकी आँखें भर आईं, लेकिन होंठों पर अब भी मुस्कान थी।“कभी-कभी प्यार को दूर हो जाना पड़ता है… ताकि यादें पास रह सकें।

मुझे लगा जैसे समय थम गया हो। उस कॉफ़ी के कप से उठती भाप में, बारिश की ठंडी हवा में, और उस अधूरी मुस्कान में ... मैं अपनी पूरी ज़िंदगी देख रहा था।

बारिश और तेज़ हुई। उसने कॉफ़ी का आख़िरी घूंट लिया, कप मेरी ओर बढ़ाया और फुसफुसाकर बोली...“तुम्हारी कॉफ़ी अब भी वैसी ही है… बस मैं थोड़ी बदल गई हूँ।” 

और अगले ही पल, वो चली गई। बालकनी में बस खाली कप रह गया, और मैं…बरसती बूंदों में घुली उसकी यादें पीता रह गया।

~दीपक

Friday, 1 August 2025

"कुछ सवाल अधूरे, कुछ खामोश जवाब"



"मिलोगे?"
एक सीधा-सा सवाल था वो, पर उसके पीछे एक इंतज़ार था, एक चाह थी, और शायद एक आखिरी उम्मीद भी।

चिराग़ ने ये सवाल इसलिए नहीं पूछा था कि उन्हें जवाब चाहिए था, बल्कि इसलिए पूछा था कि शायद इस बार जवाब कुछ और हो… शायद इस बार सामने वाला कह दे, "हां, मिलते हैं।"

लेकिन दिव्या का जवाब सीधा था ...
हर बार मना करने के बाद भी आप क्यों पूछते हैं मुझसे?
उसके शब्दों में झुंझलाहट नहीं थी, लेकिन एक उलझन थी कि जब न मिलना तय हो गया है, तो फिर मिलने की बात क्यों?

चिराग़ ने बस "ओके" कहकर बात खत्म करनी चाही, पर दिव्या फिर खुद ही पूछ बैठी –
"क्या ओके... मैं बस पूछ रही थी।"

उसने भी शायद दिल से समझा कि चिराग़ का सवाल यूँ ही नहीं था। लेकिन चिराग़ जान चुका था कि अब इस सवाल के जवाब में वही पुराना सन्नाटा मिलेगा। इसलिए उसने खुद से कहा “इसके पीछे का कारण शायद मैं समझ नहीं पाऊं।

और फिर अगली सुबह ...
एक लंबा, भावनाओं से भरा संदेश, जो चिराग़ ने दिल से लिखा ...
Don’t worry… ये आखिरी बार था।
शायद तुम कहीं ज्यादा व्यस्त हो, या शायद अब तुम्हारे मन में मेरे लिए पहले जैसा कुछ भी नहीं रहा। मैंने कोशिश की, क्योंकि ये रिश्ता मेरे लिए मायने रखता है। लेकिन अब मैं तुम्हें स्पेस देता हूं… क्योंकि बार-बार दरवाज़ा खटखटाना तब ठीक नहीं होता जब सामने वाला दरवाज़ा खोलना ही नहीं चाहता।
ख़्याल रखना।”

ये शब्द सिर्फ विदाई नहीं थे, ये एक थके हुए दिल की आखिरी आवाज़ थी। लेकिन कहानी का मोड़ वहीं से शुरू हुआ।
दिव्या का जवाब आया ...
 “मैंने सच में बहुत कोशिश की आपको भुला दूं… लेकिन कहीं न कहीं वो चीज़ हमेशा रहती है अंदर। I do miss you always 🙂”

"याद आती है आपकी बहुत..."

ये वो भावनाएं थीं, जो शायद बहुत पहले कही जानी चाहिए थीं, लेकिन किसी द्वंद्व, किसी उलझन, या ईगो के आगे दब गईं थीं। अब जब चिराग़ ने पीछे हट रहा था .... शायद दिव्या को महसूस हुआ हो कि जो पीछे खड़ा था हमेशा ...हर बार मिलने के बहाने खोजता था ...अब शायद वो चला जाएगा।

चिराग़ का जवाब भी एकदम सच्चा था ...
"Same here 😔"

दोनों ने एक-दूसरे को मिस किया, एक-दूसरे की यादों में जिया, लेकिन मुलाक़ात नहीं हो पाई।

यह कहानी उन रिश्तों की है...
जहां लोग एक-दूसरे से बेहद जुड़े होते हैं,
लेकिन समय, हालात, या शायद कुछ न कहा गया डर; उन्हें दूर कर देता है।
जहां प्यार तो होता है, लेकिन साथ नहीं। जहां बातों से ज़्यादा ख़ामोशियां बोलती हैं, और कभी-कभी सबसे गहरी बातें वहीं छुपी होती हैं, जहां दो शब्द भी कहे नहीं जाते।

शायद किसी और जन्म में,
किसी और वक़्त में,
किसी और मोड़ पर
ये अधूरी कहानी पूरी हो।

पर फिलहाल, यही सच्चाई है –
"कभी-कभी हम सबसे ज़्यादा उन्हीं को याद करते हैं,
जिनसे मिलना अब मुमकिन नहीं होता।"
~दीपक


Saturday, 5 July 2025

कितनी सारी बातें रह गई....

चाचा को गए लगभग साल भर हो गए । पिछले कुछ दिनों से उनकी स्मृति एकाएक उभर सी आई है । मन हर बार उसी अमरूद के पेड़ के नीचे जा रहा जहां गर्मी के दिनों में दोपहरी और शाम में चाचा किताब पढ़ते मिल जाते थे । उनकी याद आते ही एक अजीब सा अधूरापन सा महसूस होता है । लगता है कितना कुछ साथ जिया जाना अभी रह गया था । 
हमारी कभी फोन पर बात नहीं होती थी लेकिन जब भी घर जाता, उन्हें एक किताब का इंतजार ज़रूर रहता था । मैं अक्सर सोचता था एक दिन अपनी लिखी कोई किताब जब इन्हें दूंगा तो कितना अच्छा लगेगा । 
 कितनी सारी बातें रह गई । यह सब लिखते हुए बार बार मै अजीब सी पीड़ा अनुभव कर रहा हूं । किसी के चले जाने के बाद ही इतना सब अनुभव क्यों होता है । किसी अपने को अलविदा कह पाना बहुत कठिन है । शायद समय का सबसे बड़ा छल यही है कि वह हमें ये कभी नहीं बताता कि कौन सी मुलाकात आख़िरी है ।
~दीपक  

Thursday, 15 May 2025

मनचाही खुशबू और फूल

ऐसे कई सारे फूल हैं जो मुझे आकर्षित कर रहे हैं । लेकिन पास जाने पर मुझे मनचाही खुशबू नहीं मिल रही नहीं । कुछ फूल नए हैं तो कुछ पुराने । मैं अपनी बालकनी को गुलजार तो देखना चाहता हूं लेकिन एक साथ ढेर सारा नयापन मैं संभाल नहीं पाता और पुराने फूलों में अब वो खुशबू नहीं रह गई है। 

मैं सपने देखता हूं एक ऐसे फूल की जिसे मैं देर तक निहार सकूं जिसकी सुंदरता ढल जाने के बाद भी उसकी पंखुड़ियों को अपने पसंदीदा किताब के पन्नों के बीच सहेज कर रख सकूं । कभी कभी मैं आत्मसंदेह की स्थिति से भर जाता हूं । कई बार फूलों के प्रति अपने आकर्षण से मै लड़ता भी हूं । अपनी खुशियों के इतने सापेक्षिक होने पर मुझे चिढ़ होने लगी है....

~दीपक

Sunday, 4 May 2025

जीवन, सम्बन्ध और भावनात्मक जुड़ाव

जीवन में सम्बन्ध सिर्फ तर्क आधारित नहीं हो सकते हैं । गहराई में देखने पर भावनाऐं कई मायनों में जीने का आधार बनती है । हर किसी का व्यक्तित्व कम ज्यादा अनुपात में अच्छाइयों और बुराइयों से मिलकर ही बनता है । किसी की उपस्थिति का मायना उसके अनुपस्थिति में ज्यादा समझ आता है । मुझे नहीं पता यह वर्तमान दुनिया के लिए कितना सही है या नहीं पर मुझे लगता है जुड़ाव का असल मतलब भावनात्मक जुड़ाव ही है । 

Tuesday, 8 April 2025

एक भुरभुरी सी मेड़ और उसके आर पार खड़े हम दोनों ...

हम दोनों एक मेड़ के दोनों तरफ खड़े हैं । अपने कमजोर पलों में अक्सर जब हमारे संवेदनाओं का ज्वार चढ़ता है तो लगता है कि वह मेड़ अब भरभरा जाएगी । लेकिन ऐसे पलों में हम से कोई एक मजबूत बनकर उसे संभाल लेता है । मेरे अंदर इतनी मजबूती नहीं अक्सर यह जिम्मेदारी भी वही निभाती है । अपने शुरूआती दिनों से ही परिस्थितियों ने उसे ऐसे ढाला है कि वह जिम्मेदार होती चली आई है । हमारे रिश्ते को भी उसने ही संभाला था । और एक रोज जब उसको लगा कि यह साथ अब इस रिश्ते की कुर्बानी से ही बचा रह सकता है तो इसमें भी पहला मजबूत कदम उसी ने उठाया । वह बाहर से जितनी मजबूत दिख रही है वह अंदर से उतनी ही कोमल है, सौम्य है यह बात तो मैं पूरे दावे के साथ कह सकता हूं । मैं अक्सर सोचता हूं कि हमारे साथ के दिनों की याद आने पर वह क्या करती होगी ? मैं मिलने पर उसकी टिमटिमाती आंखें पढ़ने की कोशिश करता हूं । लेकिन वह बुत सी नजर आती है जैसे उसने अकेले में अपने आपमें बहुत कुछ जज़्ब कर लिया हो । 

~दीपक

Friday, 30 August 2024

वर्तमान जब अतीत की शक्ल लिए खड़ा होगा ...

हमारे रिश्ते में दूर चले जाने की बहुत सी वजहें हैं । लेकिन प्यार, साथ और अपनेपन के किसी धागे ने हमें अब भी बांध रखा है।  हम अपनी अपनी दुनियावों में खोते जा रहे हैं। फिर भी एक तय वक्त हमको एक दूसरे के पास लाकर खड़ा कर देता है ।  दुनियादारी की बातों के बीच सुनते सुनाते,एक दूसरे की आखों में झांकते ...हम कब और कहां खो जाते हैं पता ही नही चलता । एक ऐसी जगह जहां हममें से कोई कुछ बोलता नहीं बस एक दूसरे की जानी पहचानी सांसों की आवाज हमारे कानों में गूंज रही होती हैं । उस दिन की कल्पना से मुझे सिहरन होती है जब एक रोज शायद यह गूंज धीमी होती होती खतम हो जायेगी । और इसी डर से मैं अब इस कल्पना से भागता रहता हूं । 

मैं अक्सर सोचता हूं कि भविष्य के किसी आईने में आज का वर्तमान जब अतीत की शक्ल लिए खड़ा होगा तो मैं खुद से नजरें मिला पाऊंगा न ? या कहीं दूर तो नहीं भागूंगा ? आज की तस्वीर; जो उस वक्त तक अतीत बन जायेगी मैं उसमें रंग भरने की कशक लिए तड़फड़ाऊंगा तो नहीं ....

~दीपक

Friday, 16 August 2024

पुरुषों के नाम एक अपील

हाल ही में पश्चिम बंगाल में एक महिला प्रशिक्षु डॉक्टर के साथ घटित अमानवीय घटना ने हमारे समाज के हर व्यक्ति के दिल को झकझोर कर रख दिया है। यह घटना केवल एक व्यक्ति के साथ नहीं, बल्कि पूरे समाज के साथ हुई है। यह एक ऐसा दर्दनाक अनुभव है, जो हमारे समाज की विकृति को उजागर करता है। 


आज, जब हम एक प्रगतिशील और आधुनिक समाज की ओर बढ़ रहे हैं, तब भी ऐसी घटनाएँ यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि कहीं न कहीं हमारे समाज में पुरुषों की सोच में गंभीर खामी है। हम महिलाओं को देवी के रूप में पूजते हैं, लेकिन वास्तविक जीवन में उनके साथ हुए अत्याचारों को देखते हैं। यह विरोधाभास हमारे समाज के मूल्यों पर सवाल खड़ा करता है।
पुरुष होने के नाते, यह हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम महिलाओं के प्रति अपनी सोच को बदलें। यह आवश्यक है कि हम अपनी मानसिकता में बदलाव लाएं और महिलाओं को केवल वस्तु या मनोरंजन का साधन मानने की बजाय, उन्हें समान अधिकार और सम्मान दें। 
एक पुरुष होने का अर्थ केवल शारीरिक रूप से मजबूत होना नहीं है। इसका मतलब यह भी है कि हम मानसिक रूप से भी उतने ही परिपक्व और संवेदनशील बनें। हमें समझना होगा कि हर महिला की अपनी एक पहचान, सपने और अधिकार होते हैं। वह भी हमारी तरह इंसान है और उसे भी उसी सम्मान और सुरक्षा का अधिकार है, जिसका हकदार हम स्वयं को मानते हैं।
हमें यह भी समझना चाहिए कि महिलाओं के प्रति किए गए हमारे गलत व्यवहार का असर केवल एक महिला पर नहीं, बल्कि पूरे समाज पर पड़ता है। हमें खुद से यह सवाल पूछना होगा कि हम किस प्रकार के समाज का निर्माण कर रहे हैं? क्या यह वही समाज है जहाँ हमारी बहनें, बेटियाँ, और पत्नियाँ सुरक्षित महसूस कर सकें?
आज समय की मांग है कि हम अपनी सोच को बदलें, अपने बच्चों को भी यही सिखाएं। हमारे बेटों को यह सिखाया जाना चाहिए कि महिलाओं का सम्मान कैसे किया जाए, उनके साथ बराबरी का व्यवहार कैसे किया जाए। और इसकी शुरुआत होनी चाहिए हर परिवार और स्कूलों से ।
हमारे समाज का विकास तभी संभव है, जब हर व्यक्ति, विशेषकर पुरुष, महिलाओं के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझे और उसे निभाए।समाज के हर व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह ऐसी घटनाओं का विरोध करे, और महिलाओं के लिए एक सुरक्षित वातावरण का निर्माण करे। हमें यह समझना होगा कि महिलाओं की सुरक्षा केवल कानून का काम नहीं है, यह हमारी सामाजिक जिम्मेदारी भी है। 
आज  यह संकल्प लेने की जरूरत है कि हम अपने समाज को ऐसा बनाएँगे, जहाँ हर महिला सुरक्षित और सम्मानित महसूस करे। जहाँ कोई भी महिला बिना डर के अपने सपनों को पूरा कर सके। यही हमारे समाज के लिए सच्ची प्रगति होगी, और यही हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बेहतर दुनिया की नींव होगी।

- एक जिम्मेदार नागरिक

Friday, 15 December 2023

आगे बढ़ते रहने का नाम है जीवन या कुछ अधजिए, अचानक छूट गए को याद करना, महसूस करना ...

बहुत कुछ पीछे छोड़कर भी आगे बढ़ते रहने का नाम है जीवन या कुछ अधजिए, अचानक छूट गए को याद करना, महसूस करना है जीवन l अतीत और वर्तमान का द्वंद्व है जीवन या ओट से हल्के झलकते भविष्य या उसके सपनों को ढोना है जीवन l
जब वर्तमान खुशगवार होता है तो शायद अतीत धुंधला जाता है l लेकिन यह सच स्वीकार ही करना पड़ता है की वह पूरी तरह से कभी खत्म नहीं होता l हल्की ठंडी में गुनगुनी धूप सेंकते हम कुछ अच्छे पलों को याद करके कभी भी मुस्कुरा सकते हैं l सुबह सुबह चाय के कप की गर्मी को हथेलियों के बीच रखे कुछ ठंडे पड़ गए रिश्तों की गर्माहट को महसूस करने की कोशिश कर सकते हैं l अतीत उस शहर में अचानक लौट जाने जैसा होता है जहां आपने कभी वर्षों बिताया हुआ था लेकिन बदलाव और समय के प्रवाह ने आपको उसी अपने और अपनों के शहर में अजनबी बना दिया हो l आप अजनबीयत को ओढ़े बहुत देर तक जानी पहचानी गलियों, चौराहों पर भटकते हैं लेकिन जल्द ही वर्तमान में भाग आने को मजबूर होने लगते हैं l हम photographers की भाषा में एक term है "recreating the moments" l किसी पुरानी फोटो को दिखाकर client अक्सर ये term यूज करते हैं l हम client का दिल रखने को न भले न करें पर हमें अच्छे से पता होता है कि बहुत मेहनत से click और एडिटिंग के बाद भी हम उन पुराने पलों की गर्माहट वर्तमान में नहीं भर सकते वैसे ही जैसे पुरानी डायरी के पन्नो के बीच छिपाकर रखे गुलाब की पंखुड़ियों किसी बीते हुए वक्त के उस रंग, उस खुशबू, उस रोमांच को वापस नहीं कर सकते ...
~दीपक