Monday, 2 February 2026

मेरे आंखों के कोर में एक झील उभर आती है ..

तुम मुझे याद आते हो और याद आते रहोगे । सिर्फ इसलिए नहीं कि तुमने एक अरसे तक मेरा ख्याल रखा, मेरी छोटी छोटी जरूरतों को अपने लिए जरूरी मान लिया, मेरी आहट को पहचानने का हुनर सीख लिया । बल्कि इसलिए कि तुम्हारे प्यार ने मेरे अंदर एक अलग इंसान को शक्ल दे दिया । 

लोग कहते हैं मै बाहर से बहुत मजबूत और हँसमुख दिखता हूं । लेकिन जब मेरे अंदर का इंसान बाहरी इंसान पर हावी होता है तो  रात के अंधेरे में मेरे आंखों के कोर में एक झील उभर आती है । मुझे उस झील में तैरती ढेर सारी रंगीन तस्वीरें दिखनी लगती हैं। कभी वो पहली बार साथ देखा बर्फ का पहाड़ दिखता है, कभी नदी की तली में बहता वो पारदर्शी पानी । कभी किसी पहाड़ी फूल से तुम्हारी महक आने लगती है तो कभी किसी सुनसान रस्ते के पेड़ हमारे किस्सों के गवाह बन जाते हैं । 

मुझे पता है मैं तुम्हारे हिस्से का प्यार तुम्हें उस कदर लौटा नहीं पाया । लेकिन तुम्हारे साथ बिताए उन ढेर सारे पलों को किसी डायरी के पन्नों और आंसुओं भर में समेट भी नहीं पाया । 

~दीपक 

Monday, 26 January 2026

मैं फिर अकेला और खाली हो जाता हूं ...

मैं एक छोर पर खड़ा देखता रह जाता हूं । लोग आगे बढ़ जाते हैं । मैं पुराने दिनों को जीने के खयाल से तेज कदम से साथ चलने की कोशिशें करता हूं । लेकिन बराबर पहुंचने पर वे लोग मुझे पहचानने से इनकार कर देते हैं । 

मेरा एक मन करता है मै ठिठक जाऊं.... जो जा रहा है उसे जाने दूं ...लेकिन एक दूसरा मन...मुझे विवश करता है । मैं अपनी पहचान याद दिलाने की ढेरों कोशिशों में जुट जाता हूं । इस बार ऐसा लगता है कि सामने वाले ने मुझे पहचान लिया है ...वह थोड़ी देर रुकता भी है । लेकिन बात करते हुए मुझे  ऐसा लगता है सामने वाला सच में मुझे पहचान नहीं पाया है वह बस संवेदना के लिए रुका है । शायद उसे मुझ पर दया आ गई थी ...और ढेर सारी बातों के बाद मैं फिर अकेला और खाली हो जाता हूं ।

~दीपक

Saturday, 13 December 2025

बचपन की साथी ..जीवन में मेरी शिक्षक

कभी-कभी कुछ गहरे भावनात्मक क्षणों में दिल में भरा ढेर सारा प्रेम, बिना आवाज़ किए, धीरे-धीरे आसूं बन जाना चाहता है।
 दीदी मुझसे उम्र में बस थोड़ी सी बड़ी हैं...पर जीवन के हर मोड़ पर उन्होंने मुझसे पहले कदम रखा। 
पहले अक्षर पहचाने, पहले पेंसिल सही पकड़ी, पहियों पर संतुलन बनाना भी मुझसे पहले उन्होंने ही सीखा ;चाहे वो A B C D हो या साइकिल का हैंडल पकड़कर पूरा जीवन चलाने का हुनर।

बचपन में हम दोनों के बीच काम बँटे थे —स्कूल जाते समय टिफ़िन दीदी ले जातीं, और वापसी में खाली टिफ़िन ढोना मेरे हिस्से आता।जाते समय कभी टिफ़िन खोया नहीं,पर लौटते समय मैं अक्सर टिफिन खो जाता…लेकिन हर बार दीदी की नज़र में शिकायत कम, जिम्मेदारी ज़्यादा दिखती। शायद उसी दिन से उन्होंने घर की, रिश्तों की, और मुझ जैसे छोटे से दुनिया की जिम्मेदारी अपने कंधों पर रख ली थी।

आज भी जब देखता हूँ उन्हें ....रिश्ते निभाते,सैकड़ों काम करते ,सबके बीच मुस्कान बाँटते हुए, खुद की थकान चार दीवारों में बंद करके,बीच-बीच में औरों के जीवन के लिए, सपनों के लिए वक्त निकालती हुई —तो मन कह उठता है…दीदी तो आज भी सीखने की, आगे बढ़ने की दौड़ में सबसे आगे ही हैं। बचपन की साथी आज भी जीवन में मेरी शिक्षक है —चाहे वो शब्दों की हो… भावनाओं की, या मजबूत बनने की।
~दीपक

मजबूरी जब घुटन बन जाती है...

मजबूर होना बहुत परेशान करता है।
और जब सामने कोई उसी मजबूरी का फायदा उठाने लगे,
और आप चाहकर भी कुछ न कर पाएं,
तो वही परेशानी धीरे-धीरे घुटन में बदल जाती है।
मन भारी हो जाता है,
और खामोशी अंदर ही अंदर शोर मचाने लगती है।

सबसे ज़्यादा तकलीफ़ तब होती है
जब इंसान दूसरों से नहीं,
खुद से चिढ़ने लगता है।
मन बार-बार सवाल करता है...
“अब तक ऐसा मुकाम क्यों हासिल नहीं कर पाया
कि अपनों का सहारा बन पाता?”

यह सवाल किसी और के ताने से ज़्यादा चुभता है।
क्योंकि इसमें उम्मीद भी होती है
और खुद से नाराज़गी भी।
लगता है जैसे मेहनत अधूरी रह गई हो,
जैसे सपने रास्ते में ही थक गए हों...

~दीपक

Friday, 28 November 2025

अनकही मोहब्बत : एक अधूरी सी कहानी




लखनऊ की हल्की सर्द हवा उस रात कुछ ज़्यादा ही चुभ रही थी।
दो लोग—जो एक-दूसरे से दूर हो चुके थे... अचानक बातों में उतर आए।और यह बातचीत वही पुरानी यादों का दरवाज़ा खोल बैठी,जिसे दोनों ने बहुत कोशिशों के बाद बंद किया था।
महीनों की दूरी के बाद अचानक मैसेज आया—
एक सीधा-सा शब्द:
“Missing you…badly ”
और उसी पल दोनों की सारी मज़बूतियाँ ढह गईं।

लड़के ने मान लिया था कि उस रिश्ते को अब वापस नहीं होना—लेकिन एक मैसेज ने सालों की इच्छाओं, शिकायतों,
और आधे-अधूरे सपनों को फिर से जिंदा कर दिया।

वह लड़का लिखता गया—
“मै भी आज तक तुम्हे भूल नहीं … मै भी नहीं चाहता था कि तुम इस तरह से दूर चले जाओ…तुम खुश रहो…बस यही चाहता हूँ।”
पर उसकी उंगलियाँ काँप रहीं थीं।

और लड़की धीमे से जवाब देती—
दूर तो मैं आज भी नहीं हूँ… पर पास रह भी नहीं पाती।”

दोनों खूब हँसे, खूब छेड़ा एक-दूसरे को…लेकिन हर लाइन के पीछे एक हल्की-सी टीस छुपी थी,एक ऐसा सच जिसे दोनों जानते थे—कि ये रिश्ता दोस्ती भी नहीं बन सकता…और प्यार के नाम पर निभ भी नहीं सकता।

लड़की बार-बार कहती—
मैं तुम्हें सिर्फ़ दोस्त बनकर नहीं देख पाऊँगी। तुमसे मिलूँगी तो दिल फिर वही महसूस करेगा…और फिर वही तकलीफ़ होगी।”

लड़के ने भी दिल की बात खोल दी—
मैं तो बस इतना चाहता हूँ कि तुम मेरी ज़िंदगी से पूरी तरह गायब न हो जाओ। कभी-कभी एक संदेश भेज देना… बस इतना काफ़ी है।”

फिर दोनों ने अपने सपने सुनाए—वो सपने जो कभी पूरे नहीं होने वाले थे।

लड़की ने हँसते हुए बताया—
मैंने सपना देखा था कि तुम्हें कोई बड़ा पुरस्कार मिल रहा है,
और तुम स्टेज पर सबके सामने मेरी तारीफ़ कर रहे हो…
और मैं रो रही हूँ।”

लड़का भी मुस्कुराया—“मैंने भी सपना देखा था…तुम उस मेरी फेवरेट सारी में मेरे सामने आती हो,पहले थप्पड़ मारती हो,फिर कसकर गले लगा लेती हो…और हम दोनों रो पड़ते हैं।”

इन सपनों में जितनी हँसी थी,उतना ही दर्द भी छिपा हुआ था।
बातों-बातों में पुराने ग़लतफ़हमियाँ भी सामने आईं—
“तुमने मुझे वक़्त नहीं दिया…”
“तुमने भरोसा नहीं किया…”
“किसी तीसरे ने हमारे बीच जगह बना ली…”
“मुझे लगता था तुम भी धोखा दोगी…”

दोनों अपनी-अपनी लड़ाई लड़ते रहे,
और कभी एक-दूसरे के साथ खड़े ही न हो पाए।फिर आई वह पंक्ति…जो दोनों के दिल में चुभी—
चलो, इसे अनकहा ही रहने देते हैं…नाम मत दो इस रिश्ते को।”

और फिर हँसी-मज़ाक की कुछ हल्की बातें—
शादी, फोटो, रिजेक्शन, सपने, सरप्राइज़…
सब एक प्यारी कोशिश थी दिल की भारी रात को हल्का करने की।अंत में लड़का धीरे से बोला—
कभी ज़्यादा प्यार आए…तो एक आख़िरी बार समय निकालकर मिल लेना।”

लड़की ने बस “हम्म…” कहा—
एक छोटा-सा जवाब,
जिसमें हजारों भाव छुपे थे।

रात खत्म हुई…दोनों ने “Good night” लिखा—
और अपने-अपने कमरे की चुप्पी में जा सोए।
लेकिन उस रात…

दोनों जानते थे कि
कहानी खत्म नहीं हुई—
बस अनकही रह गई।


~दीपक

Friday, 31 October 2025

अंधेरे का कैनवास

मै बहुत देर तक उस अंधेरे में नहीं रह पाता । मै अनंत तक सोच पाने को एक छोर ढूंढ लेता हूं । जैसे रात का अंधेरा नींद आते ही एक कैनवास बन जाता है और उस पर वो सारे चित्र उग आते हैं जिनसे मै उजाले में दूर भागता रहता हूं । मै अंधेरे से ज्यादा डरता हूं या अकेलेपन से; यह मै आज तक ठीक ठीक समझ नहीं पाया । कभी कभी मुझे सपने में एक फीके रंग की दुनिया दिखती है जिसमें रंगीन तितलियां इंसानों को देखकर भागती नहीं है । वो आपस में खूब बातें करते हैं । इंसान ढेर सारे फूल लगाकर तितलियों को संदेशा भेजते है । तितलियां दूर देश से आती है। तितलियां और इंसान जब साथ हंसते हैं तो एक नया संगीन सुनाई देता है । अंत में तितलियां इंसानों के साथ हमेशा के लिए बस जाती हैं और वह फीकी दुनिया एकाएक रंगीन हो जाती है । 

~दीपक

Sunday, 14 September 2025

उसका नाम, उसका चेहरा, और उसकी अंदरूनी महक

और कुछ है जो वापस लौट आता है । हर बार कोई नया रूप धरकर । कभी उसके शहर में न रहते हुए भी; और उसके शहर में पहुंचने के बाद तो क्या ही कहने । मुझे कभी कभी लगता है उसका नाम, उसका चेहरा, और उसकी अंदरूनी महक; मेरे शरीर के भीतर कहीं चिपक गई है । वह पल अपने पूरे वजूद के साथ उभर आता हैं जब हम एक दूसरे की महक में डूबे पूरे के पूरे दिन और शामें गुजार देते थे । ऐसे दौर में कुछ अतीत के दिन जिंदा शक्ल लिए आस पास भटकने लगते है । 
मैं बकार्डी के चार पैग लगा कर एक बढ़िया माहौल के साथ वूफर पर बज रहे ग़ज़ल का आनंद ले रहा था । खिड़की के बाहर हल्की बारिश से हवाएं छन-छनकर माहौल में एक अजीब सी रोमानियत घोल रही थीं। डोर वेल बजा । मैंने गुनगुनाते हुए दरवाजा खोला। सुबह सुबह खिल आए एक फूल सी ताजगी लिए अगले पल वो मेरी बाहों में थी । एक अजीब से आकर्षण ने हमारे होठों को आपस में बांध दिया था । थोड़ी ही देर में उसकी अंदरूनी महक ने मुझे अपने कब्जे में ले लिया था । लैटिन अमेरिकी रम के नशे पर एक दूसरा नशा भारी पड़ रहा था । जितनी भी चीजें हमारे बीच थी धीरे धीरे करके दूर होती गई । मैने अपने आपको उसके बाहों के बीच निढाल छोड़ दिया । 
हम एक दूसरे में खोए रहे । बैकग्राउंड में संगीत बजता रहा । उन कई घंटों में मेरे लिए दुनिया उसके आलिंगन में सिमट गई थी । उसकी महक के साथ साथ उसके शरीर की गर्मी; मै बहुत अंदर तक महसूस कर रहा था । उसके होठों की लालिमा मेरे होठों में उतर आई थी ।उस दिन ज्यादा बातें नहीं हुई ।
शाम ढल आई । उसके वापस लौट जाने का वक्त आ गया । न मै उसे जाने देने चाहता था और न वह जाना चाहती थी । हम दोनों उस रोज दुनिया भर की घड़ियां को रोक देना चाहते थे । लेकिन वक्त रुका नहीं ...उसे जाना ही पड़ा । लेकिन जाते जाते मेरे अंदरूनी हिस्से में कुछ ऐसा छोड़ दिया जो एक मीठे दर्द के रूप में आज भी यदा कदा उभर ही आता है ।
~दीपक