एक दीपक रौशनी की तलाश में ......
यहाँ बातें करता हूँ मै कुछ दिली जज्बातों की , माझी की कुछ यादों की , राहों में ठिठके रह गए बेबस दरख्तों की , कुछ हर रोज जीते कुछ खट्ते मीठे एहसासों की .... . . बड़ा प्यारा लगता है मुझे ये एहसासों का कारवाँ....बस इन्हे शब्दों में ढालने की कला तलाश रहा हूँ....सच कहूँ अँधेरे में डूब चुकी कुछ अनजान बस्तियों के लिए रौशनी तलाश रहा हूँ .....
Monday, 13 April 2026
आपकी मानसिक शांति और आत्मसम्मान, किसी भी दोस्ती से ज्यादा कीमती है...
Thursday, 12 February 2026
मै कई दिनों से एक आसमान ढूंढ रहा हूं....
मेरे सीने में, नहीं दिल के कोने में, नहीं नहीं पूरे जेहन में कुछ भारी सा अटका हुआ है । मैं कई दिनों से सोच रहा हूं कि उसे खुरच के दूर फेंक दूं । लेकिन वह दिनों दिन भारी होता जा रहा है । मै कई दिनों से एक आसमान ढूंढ रहा हूं जहां मैं जी भर के चिल्ला सकूं और कोई मुझसे वजह न पूछे । कई दिनों से याद कर रहा लेकिन रोना भूलने की वजह से मैं डूबता जा रहा हूं । कलम से कागजों पर अक्षर की जगह एक तस्वीर बनाना चाहता हूं । एक ऐसी तस्वीर जो मुझसे बातें करते समय सिर्फ मेरी बुराइयां न गिनाए । बुराइयां हर किसी में होती है । ये बात मुझे दुनिया ने पहले ही बता रखा है ।
~दीपक
Monday, 2 February 2026
मेरे आंखों के कोर में एक झील उभर आती है ..
तुम मुझे याद आते हो और याद आते रहोगे । सिर्फ इसलिए नहीं कि तुमने एक अरसे तक मेरा ख्याल रखा, मेरी छोटी छोटी जरूरतों को अपने लिए जरूरी मान लिया, मेरी आहट को पहचानने का हुनर सीख लिया । बल्कि इसलिए कि तुम्हारे प्यार ने मेरे अंदर एक अलग इंसान को शक्ल दे दिया ।
लोग कहते हैं मै बाहर से बहुत मजबूत और हँसमुख दिखता हूं । लेकिन जब मेरे अंदर का इंसान बाहरी इंसान पर हावी होता है तो रात के अंधेरे में मेरे आंखों के कोर में एक झील उभर आती है । मुझे उस झील में तैरती ढेर सारी रंगीन तस्वीरें दिखनी लगती हैं। कभी वो पहली बार साथ देखा बर्फ का पहाड़ दिखता है, कभी नदी की तली में बहता वो पारदर्शी पानी । कभी किसी पहाड़ी फूल से तुम्हारी महक आने लगती है तो कभी किसी सुनसान रस्ते के पेड़ हमारे किस्सों के गवाह बन जाते हैं ।
मुझे पता है मैं तुम्हारे हिस्से का प्यार तुम्हें उस कदर लौटा नहीं पाया । लेकिन तुम्हारे साथ बिताए उन ढेर सारे पलों को किसी डायरी के पन्नों और आंसुओं भर में समेट भी नहीं पाया ।
~दीपक
Monday, 26 January 2026
मैं फिर अकेला और खाली हो जाता हूं ...
मैं एक छोर पर खड़ा देखता रह जाता हूं । लोग आगे बढ़ जाते हैं । मैं पुराने दिनों को जीने के खयाल से तेज कदम से साथ चलने की कोशिशें करता हूं । लेकिन बराबर पहुंचने पर वे लोग मुझे पहचानने से इनकार कर देते हैं ।
मेरा एक मन करता है मै ठिठक जाऊं.... जो जा रहा है उसे जाने दूं ...लेकिन एक दूसरा मन...मुझे विवश करता है । मैं अपनी पहचान याद दिलाने की ढेरों कोशिशों में जुट जाता हूं । इस बार ऐसा लगता है कि सामने वाले ने मुझे पहचान लिया है ...वह थोड़ी देर रुकता भी है । लेकिन बात करते हुए मुझे ऐसा लगता है सामने वाला सच में मुझे पहचान नहीं पाया है वह बस संवेदना के लिए रुका है । शायद उसे मुझ पर दया आ गई थी ...और ढेर सारी बातों के बाद मैं फिर अकेला और खाली हो जाता हूं ।
~दीपक