एक दीपक रौशनी की तलाश में ......
यहाँ बातें करता हूँ मै कुछ दिली जज्बातों की , माझी की कुछ यादों की , राहों में ठिठके रह गए बेबस दरख्तों की , कुछ हर रोज जीते कुछ खट्ते मीठे एहसासों की .... . . बड़ा प्यारा लगता है मुझे ये एहसासों का कारवाँ....बस इन्हे शब्दों में ढालने की कला तलाश रहा हूँ....सच कहूँ अँधेरे में डूब चुकी कुछ अनजान बस्तियों के लिए रौशनी तलाश रहा हूँ .....
Wednesday, 16 September 2026
पापा
Sunday, 24 May 2026
और अंत में वर्षों की यादें, संघर्ष, हँसी, अधूरी बातें और अपनापन…सब मिलकर आँसू बन जाना चाहते हैं....
कभी-कभी जीवन में कुछ रिश्ते बिना किसी औपचारिक नाम के भी परिवार बन जाते हैं। एक रूममेट… जो शुरुआत में बस “कमरा शेयर करने वाला लड़का” होता है, धीरे-धीरे आपकी रोज़मर्रा की जिंदगी का सबसे स्थायी हिस्सा बन जाता है। 6-7 साल…ये सिर्फ समय नहीं होता, ये एक पूरा युग होता है।
इन वर्षों में कितनी चीजें साथ बदलती हैं ...कमरे बदलते हैं, शहर बदलते हैं, सपने बदलते हैं, संघर्ष बदलते हैं…पर अगर कुछ स्थिर रहता है, तो वह होता है उस कमरे का दूसरा बिस्तर, जिस पर बैठा इंसान हर हार और हर उम्मीद का गवाह होता है। वह जानता है कि किस परीक्षा के बाद तुम पूरी रात चुप रहे थे। उसे याद है कि किस रिज़ल्ट के बाद तुमने बिना कुछ कहे बस छत को घूरा था। वह यह भी जानता है कि किस दिन तुम्हारी आँखों में पहली बार भरोसा लौटा था।
एक रूममेट सिर्फ साथ रहने वाला व्यक्ति नहीं होता,वह तुम्हारे संघर्षों का अनौपचारिक इतिहासकार होता है।और आज…जब उसके चयन की खबर आई, joining की तारीख तय हुई, तो खुशी तो हुई… बहुत हुई…लेकिन उस खुशी के पीछे एक अजीब-सी खाली जगह भी महसूस हुई। जैसे जिंदगी का कोई अध्याय पूरा हो रहा हो।
सोचता हूँ…अब वह बिस्तर खाली रहेगा। रात में अचानक किसी करंट अफेयर्स या दुनिया जहान की बहस नहीं होगी। “त्रिपाठी चाय पीने चलें?” जैसी आवाज़ें धीरे-धीरे यादों में बदल जाएँगी। सुबह की काली मिर्च वाली काली चाय ...अब बस एक याद सरीखा जेहन में बना रहेगा । कमरे में वही सब सामान होगा, लेकिन वह “अपनापन” शायद नहीं रहेगा।
हम अक्सर सफलता की बातें करते हैं, लेकिन सफलता के साथ आने वाली विदाइयों के बारे में कोई नहीं बताता। कोई यह नहीं बताता कि जिस दोस्त के साथ बैठकर नौकरी के सपने देखे थे,उसके सच हो जाने खुशी पर ये विदाई ...दिल पर इतना भारी भी हो सकता है। शायद इसलिए विदा करना इतना कठिन होता है ...क्योंकि कुछ लोग हमारे जीवन में आदत बन जाते हैं।
और अंत में…ढेर सारी भावनाएँ चुपचाप आँखों तक आकर ठहर जाती हैं। मन बहुत कुछ कहना चाहता है,पर शब्द कहीं पीछे छूट जाते हैं। बस ऐसा लगता है जैसे भीतर जमा वर्षों की यादें, संघर्ष, हँसी, अधूरी बातें और अपनापन…सब मिलकर आँसू बन जाना चाहते हों.....
~दीपक
Monday, 4 May 2026
मम्मा’ज़ बॉय...
Monday, 13 April 2026
आपकी मानसिक शांति और आत्मसम्मान, किसी भी दोस्ती से ज्यादा कीमती है...
Thursday, 12 February 2026
मै कई दिनों से एक आसमान ढूंढ रहा हूं....
मेरे सीने में, नहीं दिल के कोने में, नहीं नहीं पूरे जेहन में कुछ भारी सा अटका हुआ है । मैं कई दिनों से सोच रहा हूं कि उसे खुरच के दूर फेंक दूं । लेकिन वह दिनों दिन भारी होता जा रहा है । मै कई दिनों से एक आसमान ढूंढ रहा हूं जहां मैं जी भर के चिल्ला सकूं और कोई मुझसे वजह न पूछे । कई दिनों से याद कर रहा लेकिन रोना भूलने की वजह से मैं डूबता जा रहा हूं । कलम से कागजों पर अक्षर की जगह एक तस्वीर बनाना चाहता हूं । एक ऐसी तस्वीर जो मुझसे बातें करते समय सिर्फ मेरी बुराइयां न गिनाए । बुराइयां हर किसी में होती है । ये बात मुझे दुनिया ने पहले ही बता रखा है ।
~दीपक
Monday, 2 February 2026
मेरे आंखों के कोर में एक झील उभर आती है ..
तुम मुझे याद आते हो और याद आते रहोगे । सिर्फ इसलिए नहीं कि तुमने एक अरसे तक मेरा ख्याल रखा, मेरी छोटी छोटी जरूरतों को अपने लिए जरूरी मान लिया, मेरी आहट को पहचानने का हुनर सीख लिया । बल्कि इसलिए कि तुम्हारे प्यार ने मेरे अंदर एक अलग इंसान को शक्ल दे दिया ।
लोग कहते हैं मै बाहर से बहुत मजबूत और हँसमुख दिखता हूं । लेकिन जब मेरे अंदर का इंसान बाहरी इंसान पर हावी होता है तो रात के अंधेरे में मेरे आंखों के कोर में एक झील उभर आती है । मुझे उस झील में तैरती ढेर सारी रंगीन तस्वीरें दिखनी लगती हैं। कभी वो पहली बार साथ देखा बर्फ का पहाड़ दिखता है, कभी नदी की तली में बहता वो पारदर्शी पानी । कभी किसी पहाड़ी फूल से तुम्हारी महक आने लगती है तो कभी किसी सुनसान रस्ते के पेड़ हमारे किस्सों के गवाह बन जाते हैं ।
मुझे पता है मैं तुम्हारे हिस्से का प्यार तुम्हें उस कदर लौटा नहीं पाया । लेकिन तुम्हारे साथ बिताए उन ढेर सारे पलों को किसी डायरी के पन्नों और आंसुओं भर में समेट भी नहीं पाया ।
~दीपक
Monday, 26 January 2026
मैं फिर अकेला और खाली हो जाता हूं ...
मैं एक छोर पर खड़ा देखता रह जाता हूं । लोग आगे बढ़ जाते हैं । मैं पुराने दिनों को जीने के खयाल से तेज कदम से साथ चलने की कोशिशें करता हूं । लेकिन बराबर पहुंचने पर वे लोग मुझे पहचानने से इनकार कर देते हैं ।
मेरा एक मन करता है मै ठिठक जाऊं.... जो जा रहा है उसे जाने दूं ...लेकिन एक दूसरा मन...मुझे विवश करता है । मैं अपनी पहचान याद दिलाने की ढेरों कोशिशों में जुट जाता हूं । इस बार ऐसा लगता है कि सामने वाले ने मुझे पहचान लिया है ...वह थोड़ी देर रुकता भी है । लेकिन बात करते हुए मुझे ऐसा लगता है सामने वाला सच में मुझे पहचान नहीं पाया है वह बस संवेदना के लिए रुका है । शायद उसे मुझ पर दया आ गई थी ...और ढेर सारी बातों के बाद मैं फिर अकेला और खाली हो जाता हूं ।
~दीपक