Monday, 4 May 2026

मम्मा’ज़ बॉय...

कई लोग “मम्मा’ज़ बॉय” सुनते ही मुस्कुरा देते हैं, जैसे कोई हल्का-फुल्का मज़ाक हो। लेकिन मुझे लगता है कि अगर किसी लड़के को उसकी माँ ने इस कदर प्यार, समझ और संस्कार दिए हैं कि वह ज़िंदगी भर उससे जुड़ा रहता है… तो इससे बड़ी ताकत और क्या हो सकती है?
एक “मम्मा’ज़ बॉय” अपनी माँ की इज़्ज़त करता है, उसकी भावनाओं को समझता है। वह जानता है कि उसकी हर छोटी-बड़ी खुशी के पीछे उसकी माँ की अनगिनत कुर्बानियाँ छुपी हैं। इसलिए वह कभी भी उसे नजरअंदाज नहीं कर सकता।
मैं उन लोगों में से हूँ जो अपनी मम्मी से रोज़ कम से कम एक बार बात ज़रूर करते हैं। और मै किसी वजह से न कर पाया तो शाम तक मम्मी का फोन आ जाता है ।  मेरा छोटा भाई मजाक मजाक में अक्सर कहता है ...“लो आ गया माता जी के प्रिय पुत्र का फोन !”
अब ये कॉल सिर्फ “खाना खाया?” तक सीमित नहीं रहती… मेरी मम्मी मेरे लिए एकदम “परिवारिक सूचना केंद्र” जैसी हैं।
आस पड़ोस किसकी तबीयत कैसी है, बहनों और मामा के घर क्या नया हुआ, पड़ोस में किसकी शादी तय हो गई (विशेषरूप से).....पापा के किस गलती पर आज मम्मी को गुस्सा आई , छोटा भाई और भांजी आजकल कितनी देर देर तक मोबाइल चला रहे हैं 😄 आदि आदि ... .सारी अपडेट्स सबसे पहले वहीं से मिलती हैं। 
और मज़े की बात ये है कि कभी-कभी हमारी बातें घर-परिवार से निकलकर सीधे देश-विदेश तक पहुँच जाती हैं।
"क्या मोदी जी भी मछली खाने लगे हैं 😀"
“आजकल गैस के दाम इतने क्यों बढ़ रहे हैं?”
“ये ट्रंप लड़ाई झगड़ा क्यूँ कर रहा है ?” आदि आदि ...

लेकिन इस हँसी-मज़ाक के पीछे एक गहरी बात भी है…
माँ के साथ ये जुड़ाव सिर्फ बातों तक सीमित नहीं रहता, ये मेरे व्यवहार को भी प्रभावित करता है। शायद यही वजह है कि मैं हर महिला, खासकर लड़कियों के प्रति थोड़ा ज्यादा संवेदनशील रहता हूँ। उनकी बातों को सुनना, उनकी भावनाओं को समझना, उनकी इज़्ज़त करना... ये सब मैंने कहीं बाहर से नहीं सीखा, ये सब तो मम्मी ने ही सिखाया है।

तो हाँ…
मैं “मम्मा’ज़ बॉय” हूँ।
क्योंकि दिन के अंत में, ये “मम्मा’ज़ बॉय” होना ही है…
जो मुझे थोड़ा इमोशनल बनाता है, थोड़ा समझदार… और मेरे अंदर थोड़ा-सा बचपन जिंदा रखे रहता है | 
~दीपक


Monday, 13 April 2026

आपकी मानसिक शांति और आत्मसम्मान, किसी भी दोस्ती से ज्यादा कीमती है...

दोस्ती और रिश्ते हमारे जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। ये हमें सहारा देते हैं, हमें समझते हैं और हमारे जीवन को खूबसूरत बनाते हैं। लेकिन हर रिश्ता तभी तक अच्छा है, जब तक उसमें सम्मान, समझ और सकारात्मकता बनी रहती है।

मेरे लिए किसी को अपनी “अच्छे दोस्तों” की सूची में रखना या नहीं रखना, यह पूरी तरह उसके व्यवहार पर निर्भर करता है। हर इंसान में अच्छाई और बुराई दोनों होती हैं...यह मानव स्वभाव है। लेकिन असली फर्क इस बात से पड़ता है कि कोई व्यक्ति आपकी किन बातों पर ध्यान देता है।
अगर कोई आपकी अच्छाइयों को नजरअंदाज करके केवल आपकी कमियों को गिनता है,पीठ पीछे बुराई करता है,बार-बार आपको नीचा दिखाने की कोशिश करता है, तो यह संकेत है कि वह दोस्ती आपके मानसिक संतुलन के लिए सही नहीं है। 

ऐसा नहीं है एक दोस्त को हमेशा आपमें अच्छाई ही दिखनी चाहिए । कुछ गलत है तो उसको कहना भी जरूरी है लेकिन लहजा मायने रखता है ।

खुद की शांति, आत्मसम्मान और मानसिक संतुलन किसी भी दोस्ती या रिश्ते से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। जो लोग आपको समझते हैं, आपकी कद्र करते हैं और आपकी अच्छाइयों को पहचानते हैं, वही आपके सच्चे साथी होते हैं।
बाकी लोगों से दूरी बना लेना कमजोरी नहीं, बल्कि खुद के प्रति आपकी समझदारी और सम्मान को दर्शाता है।
क्योंकि “आपकी मानसिक शांति और आत्मसम्मान, किसी भी दोस्ती से ज्यादा कीमती है।” 
~दीपक

Thursday, 12 February 2026

मै कई दिनों से एक आसमान ढूंढ रहा हूं....

मेरे सीने में, नहीं दिल के कोने में, नहीं नहीं पूरे जेहन में कुछ भारी सा अटका हुआ है । मैं कई दिनों से सोच रहा हूं कि उसे खुरच के दूर फेंक दूं । लेकिन वह दिनों दिन भारी होता जा रहा है । मै कई दिनों से एक आसमान ढूंढ रहा हूं जहां मैं जी भर के चिल्ला सकूं और कोई मुझसे वजह न पूछे । कई दिनों से याद कर रहा लेकिन रोना भूलने की वजह से मैं डूबता जा रहा हूं । कलम से कागजों पर अक्षर की जगह एक तस्वीर बनाना चाहता हूं । एक ऐसी तस्वीर जो मुझसे बातें करते समय सिर्फ मेरी बुराइयां न गिनाए । बुराइयां हर किसी में होती है । ये बात मुझे दुनिया ने पहले ही बता रखा है । 

~दीपक







Monday, 2 February 2026

मेरे आंखों के कोर में एक झील उभर आती है ..

तुम मुझे याद आते हो और याद आते रहोगे । सिर्फ इसलिए नहीं कि तुमने एक अरसे तक मेरा ख्याल रखा, मेरी छोटी छोटी जरूरतों को अपने लिए जरूरी मान लिया, मेरी आहट को पहचानने का हुनर सीख लिया । बल्कि इसलिए कि तुम्हारे प्यार ने मेरे अंदर एक अलग इंसान को शक्ल दे दिया । 

लोग कहते हैं मै बाहर से बहुत मजबूत और हँसमुख दिखता हूं । लेकिन जब मेरे अंदर का इंसान बाहरी इंसान पर हावी होता है तो  रात के अंधेरे में मेरे आंखों के कोर में एक झील उभर आती है । मुझे उस झील में तैरती ढेर सारी रंगीन तस्वीरें दिखनी लगती हैं। कभी वो पहली बार साथ देखा बर्फ का पहाड़ दिखता है, कभी नदी की तली में बहता वो पारदर्शी पानी । कभी किसी पहाड़ी फूल से तुम्हारी महक आने लगती है तो कभी किसी सुनसान रस्ते के पेड़ हमारे किस्सों के गवाह बन जाते हैं । 

मुझे पता है मैं तुम्हारे हिस्से का प्यार तुम्हें उस कदर लौटा नहीं पाया । लेकिन तुम्हारे साथ बिताए उन ढेर सारे पलों को किसी डायरी के पन्नों और आंसुओं भर में समेट भी नहीं पाया । 

~दीपक 

Monday, 26 January 2026

मैं फिर अकेला और खाली हो जाता हूं ...

मैं एक छोर पर खड़ा देखता रह जाता हूं । लोग आगे बढ़ जाते हैं । मैं पुराने दिनों को जीने के खयाल से तेज कदम से साथ चलने की कोशिशें करता हूं । लेकिन बराबर पहुंचने पर वे लोग मुझे पहचानने से इनकार कर देते हैं । 

मेरा एक मन करता है मै ठिठक जाऊं.... जो जा रहा है उसे जाने दूं ...लेकिन एक दूसरा मन...मुझे विवश करता है । मैं अपनी पहचान याद दिलाने की ढेरों कोशिशों में जुट जाता हूं । इस बार ऐसा लगता है कि सामने वाले ने मुझे पहचान लिया है ...वह थोड़ी देर रुकता भी है । लेकिन बात करते हुए मुझे  ऐसा लगता है सामने वाला सच में मुझे पहचान नहीं पाया है वह बस संवेदना के लिए रुका है । शायद उसे मुझ पर दया आ गई थी ...और ढेर सारी बातों के बाद मैं फिर अकेला और खाली हो जाता हूं ।

~दीपक

Saturday, 13 December 2025

बचपन की साथी ..जीवन में मेरी शिक्षक

कभी-कभी कुछ गहरे भावनात्मक क्षणों में दिल में भरा ढेर सारा प्रेम, बिना आवाज़ किए, धीरे-धीरे आसूं बन जाना चाहता है।
 दीदी मुझसे उम्र में बस थोड़ी सी बड़ी हैं...पर जीवन के हर मोड़ पर उन्होंने मुझसे पहले कदम रखा। 
पहले अक्षर पहचाने, पहले पेंसिल सही पकड़ी, पहियों पर संतुलन बनाना भी मुझसे पहले उन्होंने ही सीखा ;चाहे वो A B C D हो या साइकिल का हैंडल पकड़कर पूरा जीवन चलाने का हुनर।

बचपन में हम दोनों के बीच काम बँटे थे —स्कूल जाते समय टिफ़िन दीदी ले जातीं, और वापसी में खाली टिफ़िन ढोना मेरे हिस्से आता।जाते समय कभी टिफ़िन खोया नहीं,पर लौटते समय मैं अक्सर टिफिन खो जाता…लेकिन हर बार दीदी की नज़र में शिकायत कम, जिम्मेदारी ज़्यादा दिखती। शायद उसी दिन से उन्होंने घर की, रिश्तों की, और मुझ जैसे छोटे से दुनिया की जिम्मेदारी अपने कंधों पर रख ली थी।

आज भी जब देखता हूँ उन्हें ....रिश्ते निभाते,सैकड़ों काम करते ,सबके बीच मुस्कान बाँटते हुए, खुद की थकान चार दीवारों में बंद करके,बीच-बीच में औरों के जीवन के लिए, सपनों के लिए वक्त निकालती हुई —तो मन कह उठता है…दीदी तो आज भी सीखने की, आगे बढ़ने की दौड़ में सबसे आगे ही हैं। बचपन की साथी आज भी जीवन में मेरी शिक्षक है —चाहे वो शब्दों की हो… भावनाओं की, या मजबूत बनने की।
~दीपक

मजबूरी जब घुटन बन जाती है...

मजबूर होना बहुत परेशान करता है।
और जब सामने कोई उसी मजबूरी का फायदा उठाने लगे,
और आप चाहकर भी कुछ न कर पाएं,
तो वही परेशानी धीरे-धीरे घुटन में बदल जाती है।
मन भारी हो जाता है,
और खामोशी अंदर ही अंदर शोर मचाने लगती है।

सबसे ज़्यादा तकलीफ़ तब होती है
जब इंसान दूसरों से नहीं,
खुद से चिढ़ने लगता है।
मन बार-बार सवाल करता है...
“अब तक ऐसा मुकाम क्यों हासिल नहीं कर पाया
कि अपनों का सहारा बन पाता?”

यह सवाल किसी और के ताने से ज़्यादा चुभता है।
क्योंकि इसमें उम्मीद भी होती है
और खुद से नाराज़गी भी।
लगता है जैसे मेहनत अधूरी रह गई हो,
जैसे सपने रास्ते में ही थक गए हों...

~दीपक