और जब सामने कोई उसी मजबूरी का फायदा उठाने लगे,
और आप चाहकर भी कुछ न कर पाएं,
तो वही परेशानी धीरे-धीरे घुटन में बदल जाती है।
मन भारी हो जाता है,
और खामोशी अंदर ही अंदर शोर मचाने लगती है।
सबसे ज़्यादा तकलीफ़ तब होती है
जब इंसान दूसरों से नहीं,
खुद से चिढ़ने लगता है।
मन बार-बार सवाल करता है...
“अब तक ऐसा मुकाम क्यों हासिल नहीं कर पाया
कि अपनों का सहारा बन पाता?”
यह सवाल किसी और के ताने से ज़्यादा चुभता है।
क्योंकि इसमें उम्मीद भी होती है
और खुद से नाराज़गी भी।
लगता है जैसे मेहनत अधूरी रह गई हो,
जैसे सपने रास्ते में ही थक गए हों...
~दीपक
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