कभी-कभी जीवन में कुछ रिश्ते बिना किसी औपचारिक नाम के भी परिवार बन जाते हैं। एक रूममेट… जो शुरुआत में बस “कमरा शेयर करने वाला लड़का” होता है, धीरे-धीरे आपकी रोज़मर्रा की जिंदगी का सबसे स्थायी हिस्सा बन जाता है। 6-7 साल…ये सिर्फ समय नहीं होता, ये एक पूरा युग होता है।
इन वर्षों में कितनी चीजें साथ बदलती हैं ...कमरे बदलते हैं, शहर बदलते हैं, सपने बदलते हैं, संघर्ष बदलते हैं…पर अगर कुछ स्थिर रहता है, तो वह होता है उस कमरे का दूसरा बिस्तर, जिस पर बैठा इंसान हर हार और हर उम्मीद का गवाह होता है। वह जानता है कि किस परीक्षा के बाद तुम पूरी रात चुप रहे थे। उसे याद है कि किस रिज़ल्ट के बाद तुमने बिना कुछ कहे बस छत को घूरा था। वह यह भी जानता है कि किस दिन तुम्हारी आँखों में पहली बार भरोसा लौटा था।
एक रूममेट सिर्फ साथ रहने वाला व्यक्ति नहीं होता,वह तुम्हारे संघर्षों का अनौपचारिक इतिहासकार होता है।और आज…जब उसके चयन की खबर आई, joining की तारीख तय हुई, तो खुशी तो हुई… बहुत हुई…लेकिन उस खुशी के पीछे एक अजीब-सी खाली जगह भी महसूस हुई। जैसे जिंदगी का कोई अध्याय पूरा हो रहा हो।
सोचता हूँ…अब वह बिस्तर खाली रहेगा। रात में अचानक किसी करंट अफेयर्स या दुनिया जहान की बहस नहीं होगी। “त्रिपाठी चाय पीने चलें?” जैसी आवाज़ें धीरे-धीरे यादों में बदल जाएँगी। सुबह की काली मिर्च वाली काली चाय ...अब बस एक याद सरीखा जेहन में बना रहेगा । कमरे में वही सब सामान होगा, लेकिन वह “अपनापन” शायद नहीं रहेगा।
हम अक्सर सफलता की बातें करते हैं, लेकिन सफलता के साथ आने वाली विदाइयों के बारे में कोई नहीं बताता। कोई यह नहीं बताता कि जिस दोस्त के साथ बैठकर नौकरी के सपने देखे थे,उसके सच हो जाने खुशी पर ये विदाई ...दिल पर इतना भारी भी हो सकता है। शायद इसलिए विदा करना इतना कठिन होता है ...क्योंकि कुछ लोग हमारे जीवन में आदत बन जाते हैं।
और अंत में…ढेर सारी भावनाएँ चुपचाप आँखों तक आकर ठहर जाती हैं। मन बहुत कुछ कहना चाहता है,पर शब्द कहीं पीछे छूट जाते हैं। बस ऐसा लगता है जैसे भीतर जमा वर्षों की यादें, संघर्ष, हँसी, अधूरी बातें और अपनापन…सब मिलकर आँसू बन जाना चाहते हों.....
~दीपक
🫂🥹
ReplyDeleteWow 😲😲
ReplyDeleteशब्द वाकई पीछे छूट गए हैं🫂
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