Sunday, 24 May 2026

और अंत में वर्षों की यादें, संघर्ष, हँसी, अधूरी बातें और अपनापन…सब मिलकर आँसू बन जाना चाहते हैं....

कभी-कभी जीवन में कुछ रिश्ते बिना किसी औपचारिक नाम के भी परिवार बन जाते हैं। एक रूममेट… जो शुरुआत में बस “कमरा शेयर करने वाला लड़का” होता है, धीरे-धीरे आपकी रोज़मर्रा की जिंदगी का सबसे स्थायी हिस्सा बन जाता है। 6-7 साल…ये सिर्फ समय नहीं होता, ये एक पूरा युग होता है।

इन वर्षों में कितनी चीजें साथ बदलती हैं ...कमरे बदलते हैं, शहर बदलते हैं, सपने बदलते हैं, संघर्ष बदलते हैं…पर अगर कुछ स्थिर रहता है, तो वह होता है उस कमरे का दूसरा बिस्तर, जिस पर बैठा इंसान हर हार और हर उम्मीद का गवाह होता है। वह जानता है कि किस परीक्षा के बाद तुम पूरी रात चुप रहे थे। उसे याद है कि किस रिज़ल्ट के बाद तुमने बिना कुछ कहे बस छत को घूरा था। वह यह भी जानता है कि किस दिन तुम्हारी आँखों में पहली बार भरोसा लौटा था।

एक रूममेट सिर्फ साथ रहने वाला व्यक्ति नहीं होता,वह तुम्हारे संघर्षों का अनौपचारिक इतिहासकार होता है।और आज…जब उसके चयन की खबर आई, joining की तारीख तय हुई, तो खुशी तो हुई… बहुत हुई…लेकिन उस खुशी के पीछे एक अजीब-सी खाली जगह भी महसूस हुई। जैसे जिंदगी का कोई अध्याय पूरा हो रहा हो।


सोचता हूँ…अब वह बिस्तर खाली रहेगा। रात में अचानक किसी करंट अफेयर्स या दुनिया जहान की बहस नहीं होगी। “त्रिपाठी चाय पीने चलें?” जैसी आवाज़ें धीरे-धीरे यादों में बदल जाएँगी। सुबह की काली मिर्च वाली काली चाय ...अब बस एक याद सरीखा जेहन में बना रहेगा । कमरे में वही सब सामान होगा, लेकिन वह “अपनापन” शायद नहीं रहेगा।

हम अक्सर सफलता की बातें करते हैं, लेकिन सफलता के साथ आने वाली विदाइयों के बारे में कोई नहीं बताता। कोई यह नहीं बताता कि जिस दोस्त के साथ बैठकर नौकरी के सपने देखे थे,उसके सच हो जाने खुशी पर ये विदाई  ...दिल पर इतना भारी भी हो सकता है। शायद इसलिए विदा करना इतना कठिन होता है ...क्योंकि कुछ लोग हमारे जीवन में आदत बन जाते हैं। 

और अंत में…ढेर सारी भावनाएँ चुपचाप आँखों तक आकर ठहर जाती हैं। मन बहुत कुछ कहना चाहता है,पर शब्द कहीं पीछे छूट जाते हैं। बस ऐसा लगता है जैसे भीतर जमा वर्षों की यादें, संघर्ष, हँसी, अधूरी बातें और अपनापन…सब मिलकर आँसू बन जाना चाहते हों.....

~दीपक 

Monday, 4 May 2026

मम्मा’ज़ बॉय...

कई लोग “मम्मा’ज़ बॉय” सुनते ही मुस्कुरा देते हैं, जैसे कोई हल्का-फुल्का मज़ाक हो। लेकिन मुझे लगता है कि अगर किसी लड़के को उसकी माँ ने इस कदर प्यार, समझ और संस्कार दिए हैं कि वह ज़िंदगी भर उससे जुड़ा रहता है… तो इससे बड़ी ताकत और क्या हो सकती है?
एक “मम्मा’ज़ बॉय” अपनी माँ की इज़्ज़त करता है, उसकी भावनाओं को समझता है। वह जानता है कि उसकी हर छोटी-बड़ी खुशी के पीछे उसकी माँ की अनगिनत कुर्बानियाँ छुपी हैं। इसलिए वह कभी भी उसे नजरअंदाज नहीं कर सकता।
मैं उन लोगों में से हूँ जो अपनी मम्मी से रोज़ कम से कम एक बार बात ज़रूर करते हैं। और मै किसी वजह से न कर पाया तो शाम तक मम्मी का फोन आ जाता है ।  मेरा छोटा भाई मजाक मजाक में अक्सर कहता है ...“लो आ गया माता जी के प्रिय पुत्र का फोन !”
अब ये कॉल सिर्फ “खाना खाया?” तक सीमित नहीं रहती… मेरी मम्मी मेरे लिए एकदम “परिवारिक सूचना केंद्र” जैसी हैं।
आस पड़ोस किसकी तबीयत कैसी है, बहनों और मामा के घर क्या नया हुआ, पड़ोस में किसकी शादी तय हो गई (विशेषरूप से).....पापा के किस गलती पर आज मम्मी को गुस्सा आई , छोटा भाई और भांजी आजकल कितनी देर देर तक मोबाइल चला रहे हैं 😄 आदि आदि ... .सारी अपडेट्स सबसे पहले वहीं से मिलती हैं। 
और मज़े की बात ये है कि कभी-कभी हमारी बातें घर-परिवार से निकलकर सीधे देश-विदेश तक पहुँच जाती हैं।
"क्या मोदी जी भी मछली खाने लगे हैं 😀"
“आजकल गैस के दाम इतने क्यों बढ़ रहे हैं?”
“ये ट्रंप लड़ाई झगड़ा क्यूँ कर रहा है ?” आदि आदि ...

लेकिन इस हँसी-मज़ाक के पीछे एक गहरी बात भी है…
माँ के साथ ये जुड़ाव सिर्फ बातों तक सीमित नहीं रहता, ये मेरे व्यवहार को भी प्रभावित करता है। शायद यही वजह है कि मैं हर महिला, खासकर लड़कियों के प्रति थोड़ा ज्यादा संवेदनशील रहता हूँ। उनकी बातों को सुनना, उनकी भावनाओं को समझना, उनकी इज़्ज़त करना... ये सब मैंने कहीं बाहर से नहीं सीखा, ये सब तो मम्मी ने ही सिखाया है।

तो हाँ…
मैं “मम्मा’ज़ बॉय” हूँ।
क्योंकि दिन के अंत में, ये “मम्मा’ज़ बॉय” होना ही है…
जो मुझे थोड़ा इमोशनल बनाता है, थोड़ा समझदार… और मेरे अंदर थोड़ा-सा बचपन जिंदा रखे रहता है | 
~दीपक