एक “मम्मा’ज़ बॉय” अपनी माँ की इज़्ज़त करता है, उसकी भावनाओं को समझता है। वह जानता है कि उसकी हर छोटी-बड़ी खुशी के पीछे उसकी माँ की अनगिनत कुर्बानियाँ छुपी हैं। इसलिए वह कभी भी उसे नजरअंदाज नहीं कर सकता।
मैं उन लोगों में से हूँ जो अपनी मम्मी से रोज़ कम से कम एक बार बात ज़रूर करते हैं। और मै किसी वजह से न कर पाया तो शाम तक मम्मी का फोन आ जाता है । मेरा छोटा भाई मजाक मजाक में अक्सर कहता है ...“लो आ गया माता जी के प्रिय पुत्र का फोन !”
अब ये कॉल सिर्फ “खाना खाया?” तक सीमित नहीं रहती… मेरी मम्मी मेरे लिए एकदम “परिवारिक सूचना केंद्र” जैसी हैं।
आस पड़ोस किसकी तबीयत कैसी है, बहनों और मामा के घर क्या नया हुआ, पड़ोस में किसकी शादी तय हो गई (विशेषरूप से).....पापा के किस गलती पर आज मम्मी को गुस्सा आई , छोटा भाई और भांजी आजकल कितनी देर देर तक मोबाइल चला रहे हैं 😄 आदि आदि ... .सारी अपडेट्स सबसे पहले वहीं से मिलती हैं।
और मज़े की बात ये है कि कभी-कभी हमारी बातें घर-परिवार से निकलकर सीधे देश-विदेश तक पहुँच जाती हैं।
"क्या मोदी जी भी मछली खाने लगे हैं 😀"
“आजकल गैस के दाम इतने क्यों बढ़ रहे हैं?”
“ये ट्रंप लड़ाई झगड़ा क्यूँ कर रहा है ?” आदि आदि ...
लेकिन इस हँसी-मज़ाक के पीछे एक गहरी बात भी है…
माँ के साथ ये जुड़ाव सिर्फ बातों तक सीमित नहीं रहता, ये मेरे व्यवहार को भी प्रभावित करता है। शायद यही वजह है कि मैं हर महिला, खासकर लड़कियों के प्रति थोड़ा ज्यादा संवेदनशील रहता हूँ। उनकी बातों को सुनना, उनकी भावनाओं को समझना, उनकी इज़्ज़त करना... ये सब मैंने कहीं बाहर से नहीं सीखा, ये सब तो मम्मी ने ही सिखाया है।
तो हाँ…
मैं “मम्मा’ज़ बॉय” हूँ।
क्योंकि दिन के अंत में, ये “मम्मा’ज़ बॉय” होना ही है…
जो मुझे थोड़ा इमोशनल बनाता है, थोड़ा समझदार… और मेरे अंदर थोड़ा-सा बचपन जिंदा रखे रहता है |
~दीपक