"मिलोगे?"
एक सीधा-सा सवाल था वो, पर उसके पीछे एक इंतज़ार था, एक चाह थी, और शायद एक आखिरी उम्मीद भी।
चिराग़ ने ये सवाल इसलिए नहीं पूछा था कि उन्हें जवाब चाहिए था, बल्कि इसलिए पूछा था कि शायद इस बार जवाब कुछ और हो… शायद इस बार सामने वाला कह दे, "हां, मिलते हैं।"
लेकिन दिव्या का जवाब सीधा था ...
“हर बार मना करने के बाद भी आप क्यों पूछते हैं मुझसे?”
उसके शब्दों में झुंझलाहट नहीं थी, लेकिन एक उलझन थी कि जब न मिलना तय हो गया है, तो फिर मिलने की बात क्यों?
चिराग़ ने बस "ओके" कहकर बात खत्म करनी चाही, पर दिव्या फिर खुद ही पूछ बैठी –
"क्या ओके... मैं बस पूछ रही थी।"
उसने भी शायद दिल से समझा कि चिराग़ का सवाल यूँ ही नहीं था। लेकिन चिराग़ जान चुका था कि अब इस सवाल के जवाब में वही पुराना सन्नाटा मिलेगा। इसलिए उसने खुद से कहा “इसके पीछे का कारण शायद मैं समझ नहीं पाऊं।”
और फिर अगली सुबह ...
एक लंबा, भावनाओं से भरा संदेश, जो चिराग़ ने दिल से लिखा ...
“Don’t worry… ये आखिरी बार था।
शायद तुम कहीं ज्यादा व्यस्त हो, या शायद अब तुम्हारे मन में मेरे लिए पहले जैसा कुछ भी नहीं रहा। मैंने कोशिश की, क्योंकि ये रिश्ता मेरे लिए मायने रखता है। लेकिन अब मैं तुम्हें स्पेस देता हूं… क्योंकि बार-बार दरवाज़ा खटखटाना तब ठीक नहीं होता जब सामने वाला दरवाज़ा खोलना ही नहीं चाहता।
ख़्याल रखना।”
ये शब्द सिर्फ विदाई नहीं थे, ये एक थके हुए दिल की आखिरी आवाज़ थी। लेकिन कहानी का मोड़ वहीं से शुरू हुआ।
दिव्या का जवाब आया ...
“मैंने सच में बहुत कोशिश की आपको भुला दूं… लेकिन कहीं न कहीं वो चीज़ हमेशा रहती है अंदर। I do miss you always 🙂”
"याद आती है आपकी बहुत..."
ये वो भावनाएं थीं, जो शायद बहुत पहले कही जानी चाहिए थीं, लेकिन किसी द्वंद्व, किसी उलझन, या ईगो के आगे दब गईं थीं। अब जब चिराग़ ने पीछे हट रहा था .... शायद दिव्या को महसूस हुआ हो कि जो पीछे खड़ा था हमेशा ...हर बार मिलने के बहाने खोजता था ...अब शायद वो चला जाएगा।
चिराग़ का जवाब भी एकदम सच्चा था ...
"Same here 😔"
दोनों ने एक-दूसरे को मिस किया, एक-दूसरे की यादों में जिया, लेकिन मुलाक़ात नहीं हो पाई।
यह कहानी उन रिश्तों की है...
जहां लोग एक-दूसरे से बेहद जुड़े होते हैं,
लेकिन समय, हालात, या शायद कुछ न कहा गया डर; उन्हें दूर कर देता है।
जहां प्यार तो होता है, लेकिन साथ नहीं। जहां बातों से ज़्यादा ख़ामोशियां बोलती हैं, और कभी-कभी सबसे गहरी बातें वहीं छुपी होती हैं, जहां दो शब्द भी कहे नहीं जाते।
शायद किसी और जन्म में,
किसी और वक़्त में,
किसी और मोड़ पर
ये अधूरी कहानी पूरी हो।
पर फिलहाल, यही सच्चाई है –
"कभी-कभी हम सबसे ज़्यादा उन्हीं को याद करते हैं,
जिनसे मिलना अब मुमकिन नहीं होता।"
~दीपक
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