मैं बकार्डी के चार पैग लगा कर एक बढ़िया माहौल के साथ वूफर पर बज रहे ग़ज़ल का आनंद ले रहा था । खिड़की के बाहर हल्की बारिश से हवाएं छन-छनकर माहौल में एक अजीब सी रोमानियत घोल रही थीं। डोर वेल बजा । मैंने गुनगुनाते हुए दरवाजा खोला। सुबह सुबह खिल आए एक फूल सी ताजगी लिए अगले पल वो मेरी बाहों में थी । एक अजीब से आकर्षण ने हमारे होठों को आपस में बांध दिया था । थोड़ी ही देर में उसकी अंदरूनी महक ने मुझे अपने कब्जे में ले लिया था । लैटिन अमेरिकी रम के नशे पर एक दूसरा नशा भारी पड़ रहा था । जितनी भी चीजें हमारे बीच थी धीरे धीरे करके दूर होती गई । मैने अपने आपको उसके बाहों के बीच निढाल छोड़ दिया ।
हम एक दूसरे में खोए रहे । बैकग्राउंड में संगीत बजता रहा । उन कई घंटों में मेरे लिए दुनिया उसके आलिंगन में सिमट गई थी । उसकी महक के साथ साथ उसके शरीर की गर्मी; मै बहुत अंदर तक महसूस कर रहा था । उसके होठों की लालिमा मेरे होठों में उतर आई थी ।उस दिन ज्यादा बातें नहीं हुई ।
शाम ढल आई । उसके वापस लौट जाने का वक्त आ गया । न मै उसे जाने देने चाहता था और न वह जाना चाहती थी । हम दोनों उस रोज दुनिया भर की घड़ियां को रोक देना चाहते थे । लेकिन वक्त रुका नहीं ...उसे जाना ही पड़ा । लेकिन जाते जाते मेरे अंदरूनी हिस्से में कुछ ऐसा छोड़ दिया जो एक मीठे दर्द के रूप में आज भी यदा कदा उभर ही आता है ।
~दीपक
Bhot khub Tripathi ji 🙌
ReplyDeleteShukriya bhai 😊
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