Saturday, 11 January 2020

एक नदी; जिसका होकर वह पूरी ज़िन्दगी गुजार देना चाहता है ...

वह शुरुआत से ही किसी ऐसी नदी की तलाश में था जो उसकी प्यास बुझा सके । वह हमेशा से सोचता था कि जिस रोज उसकी तलाश पूरी हुई वह हमेशा के लिए उस एक नदी का ही हो कर रह जायेगा पर दिली जज़्बातों तले अक्सर उसने भ्रम में कई नालों को नदी समझ लिया । जिसने उसकी प्यास बुझाना तो दूर उसके निर्मल मन को दिन ब दिन और गंदा ही किया और भरोसे और सच्चाई की कहानियां अब उसे पूर्णतः काल्पनिक लगने लगी ।

यकीनन उसे अपने  प्यास की अति का आभास था जो उसे अपनी खोज के लिए हमेशा उद्वेलित करती थी और शायद इसीलिए एक वक्त के बाद उसने भ्रमों की असलियत और  सच्चाईयों से मुँह मोड़ना शुरू कर दिया । अब वह खुद रास्ते में मिलने वाले नालों को बेमन से अंगीकार कर अपने प्यास की तृप्ति की कोशिशें करने लगा। 
प्रारप्य की उलझनों के साथ उलझता वह आगे बढ़ता गया । कभी कभी निराशा उसे एक कदर जकड़ती कि उसे अपने दिली खयालों पर शक गहराने लगता। वह अपने आप से, अपने आस-पास से ढेर सारे प्रश्न करता; बड़बड़ाता, चिल्लाता, रोता लेकिन किसी एक नदी का ही होकर रह जाने वाली उसकी सोच कभी उसके जेहन से दूर न जा सकी । 
प्रकृति हमेशा से हमें यह संदेश देती रही है कि हर रात के बाद एक  सुबह जरूर दिखेगी अगर हम खुद को जिंदा रख पाये। 
वक्त बदला और इस बार एहसासों के एक अलग बहाव ने उसे अंदर तक भिगो डाला । एक ऐसा बहाव जिसने दिन ब दिन उसके ढेरों भ्रमों और अविश्वासों को दूर कर दिया । हर गुजरते दिन के साथ उसका भरोसा और मजबूत हो रहा है, यह वही नदी है जिसका होकर वह बाकी की ज़िन्दगी जीना चाहता है ...

Saturday, 28 December 2019

नासमझी के शिकार रिश्तें ...

आज Aiims आया था । कुछ दिनों पहले भी आया था । दिल्ली Aiims का मेट्रो स्टेशन, Ina के बाद पड़ता है । जब भी मैं इधर से गुजरता हूँ वो, उसकी ढेर सारी यादें अगले कई दिनों तक मुझे घेरे रहती है । इस बार भी मैंने फ़ोन निकाला उसका नम्बर कांटेक्ट लिस्ट से सर्च जैसे हर बार करता हूँ लेकिन हिम्मत इस बार भी नहीं हुई या सच कहूं तो इस बार भी बड़ी कठिनाई से खुद को रोक पाया । इस तरह मुझे खुद को रोक पाना बहुत कठिन लगता है । कॉलेज के शुरुआती दिनों में हम बहुत दिनों तक एक दूसरे को देखते, जानते रहे लेकिन कभी हमारी बात नहीं हुई । एक रोज उसके पहल पर हम बात भी करने लगे । लेकिन दोस्त शायद हम अब भी नहीं थे पर बीतते वक्त के साथ कड़ियाँ जुड़ती गयी और हम अच्छे दोस्त बन गए । कुछ और कॉमन दोस्तों के साथ जब हमारा ग्रुप जमता तो हम साथ में गुनगुनाते, हँसते एक दूसरे और करीब आते गए। 
हम उम्र के जिस पड़ाव पर थे वहां रिश्तों की परिधियाँ कभी कभी नासमझी की शिकार हो जाती है । एक रोज ऐसा ही कुछ हुआ जिसने हमेशा हमेशा के लिए हमारे बीच ऐसे कांटें बिखेर दिए जिसने जब भी मौका मिला हमें दूर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । गलतफहमी की एक ऐसी दीवार जिसने उसकी नजरों में मुझे एक अपराधी बना दिया । मैंने उस गलतफहमी को दूर करने की को कोशिशें की लेकिन वह मेरे अपराध स्वीकारोक्ति के लिए अड़ी रही । वह औरों से थोड़ी अलग है । अपार प्रेम और थोड़ा नटखटपन, ढेर सारी जिद और उतना ही स्नेह । बाहर से सख्त दिखने वाली अंदर से उतनी ही कोमल। वह हममें इसलिए भी अलग थी क्योंकि उसका नजरिया हमसे अलग था वह दुनिया की शर्तों से परे ज़िन्दगी को अपनी समझ की कसौटी पर जीती थी । जो उसे गलत लगता उसके लिए पत्थर सी सख्त बन जाती जो सही लगता उस पर अपना स्नेह न्यौछावर करने को तत्पर रहती । शायद यही वजह थी कि मेरे स्पष्टीकरण को झूठ समझ वह मुझे कभी माफ नहीं कर पाई । 
मुझे उसकी बड़ी याद आती है कभी उसके जैसे किसी फ़िल्म के किसी पात्र को देख, कभी उसके साथ घूमें कुछ रास्तों को देख, कभी साथ गुनगुनाते किसी शाम को महसूस कर तो कभी उसकी बेबाकी को याद कर...

Tuesday, 3 December 2019

उम्मीदें..

"बिना उम्मीदों वाली ज़िन्दगी कितनी अच्छी होती है न !" 
यह बोलते हुए वो मुझसे दूर, दूर तक जाती सड़क को यूँ ही देखती जा रही थी । यह प्रश्न नहीं था और वह मेरी तरफ से इसका जवाब भी नहीं चाहती थी । उसके चेहरे की थकान गुम होकर सुकून बन रही थी । वह खुश थी, दुःखी थी, नाराज़ थी या थोड़ा थोड़ा सब; यह समझ पाना आज आसान नहीं लग रहा था । वह बिना मेरी तरफ देखे यूँ ही खोई हुई आगे बोलती रही ।
"जब हम सब कुछ वैसा ही स्वीकार करने लगते है जो जैसे होता जाता है या होता जा रहा है तो चलते रहना कितना अलग सा एहसास देने लगता है । बिना बोझ के सफर जैसा, खाली हाथ। जो जिस रूप में जैसे पसंद आ जाय उसे वैसे ही गले लगा लेना और उम्मीदी के बिना, बिना बोझ के आगे बढ़ जाना ।"
वह अभी और बोलना चाहती थी शायद । उसके ख्याल और उधेड़बुन के आगे शब्द कम पड़ रहे थे । ये बातें  प्रश्न न होते हुए भी मेरे जेहन में प्रश्न बनकर उतरते जा रहे थे । 
क्या सच में जीवन की यही सच्चाई है कि बिना उम्मीद के , आशाओं के आगे बढ़ते रहना ? 
क्या हर एहसास को हम बिना उम्मीद के उतनी तवज्जो दे पाएंगे जो हम उम्मीद के सहारे देते आएं है ? 
क्या हर रिश्ते का  रंग उतना चटक हो पायेगा जो उम्मीद की धूप में सूखकर बारिशों में भी धूमिल नही होता ?
(To be continued) 
~दीपक


Thursday, 21 November 2019

एक रंग बिरंगी तितली

उसे मुझसे प्यार था या नहीं मुझे नहीं पता पर उसे मेरा साथ यकीनन पसंद था । हम साथ होते तो दुनिया थोड़ी अलग लगने लगती थी । पत्तों की सरसराहट, ठंडी हवावों की सिहरन, चिड़ियों की चहक सब बड़े करीब से सुनाई देने लगता था । एक रोज पत्थरों की किसी पुरानी इमारत को निहारते रुमानियत में खोये हमारे होंठो को किसी चुम्बन ने बाँध लिया था  । उस रोज हम बहुत करीब आ गए थे । देर शाम तक उसकी गोदी में सर रखे मैं बड़ी देर तक कुछ सोचता रहा था और उंगुलियां मेरे बालों को सहलाती रही थी । शाम और ढली तो अंधेरा हमें और करीब लाने की कोशिशें करने लगा पर उसे घर जाने को देर होने लगी थी। उस रात हम अपने अपने हिस्से के आसमान को निहारते रहे थे।


सुबह हुई तो वह एक रंग बिरंगी तितली बन गयी थी, जिसको हर कोई अपनी मुट्ठी में बन्द कर लेने के सपने देखने लगा था । सपने मैं भी देखता था लेकिन मैंने कभी उसे मुठ्ठी में बंद नहीं किया । वह देर तक मेरी हथेली पर बैठी रहती पर मुझे उसके नए रंग बिरंगे पंख नजर नहीं आते थे। वह दिन भर जी भर के आसमान में उड़ाने भरती मैं हथेली फैलाये शाम होने का इंतजार करता । हम मिलते ही आपनी अपनी थकानें भूल जाते । वो मुझे दिन भर के अपने किस्से सुनाती और देर तक मुस्कुराता रहता । थोड़ी देर में अंधेरा गहराने लगता और वो अपने घर चली जाती । मैं भी किताबों की रोशनी में सपने बुनने में लग जाता था ।  वह चाहती थी कि किसी रोज मैं उसे मुट्ठी में बंद कर लूं पर मैं खुद को उसकी आजादी छीनने का हकदार नहीं मानता था । मैं चाहता था.....
(लिखी जा रही अधूरी कहानी का अंश )
To be continued
~दीपक

Tuesday, 19 November 2019

एक दूसरे की जरुरत बनते-बनते आदत बन गए..

नवंबर महीने के आखिरी दिन थे । सर्दियाँ ठंडी हवाओं के सहारे दस्तक दे चुकी थी । दिन ब दिन शामें ठंडी होती जा रही थी और इन्ही ठंडी शामों में हम एक दूसरे के करीब आते, एक दूसरे को प्यार करना सीख रहे थे । कभी हाथ में हाथ डाले दूर तक चलते हुए एक दूजे की छोटी छोटी खुशियों के बहाने ढूंढते, कभी चाय की चुस्कियों के साथ पार्क के पौधों पर फैली ओंस को निहारते हुये, कभी गुनगुनी धूप सेंकते एक दूजे के स्पर्श को महसूस करते हुए। हमें पता भी नही चला कि कैसे हम एक दूसरे की जरुरत बनते-बनते एक दूसरे की आदत बन गए । 
~दीपक

Saturday, 28 September 2019

अफ़सोस

मुझे आज इस बात का बहुत अफ़सोस होता है कि हमने ये कभी क्यों नही सोचा की जब हम किसी वजह से दूर हो जाएंगे तो एक दूसरे की जिन्दगियों में हमारी वजूद क्या होगा । हम कैसे जता पाएंगे अपने दिलों के गहराई में उठते उस दर्द को जो इन ठंड हवावों के आगोश में और गहरा रहा होगा। तुम जब बहुत दूर हो जाओगे तो मैं कैसे बोल पाऊंगा थोड़ी देर के लिए मुझे तुम्हारी बाहों की गर्मी में अपने ढेर सारे आँसू उलेड़ देना है । मैं क्या करूँगा उन शामों की घेरती तन्हाई में जब हर अनजान शख्स में मुझे सर्फ तुम्हारा अक्स नजर आ रहा होगा । मैं क्या करूँगा जब तुम्हारा हाथ थाम के यूँ ही चलते रहने की तलब में मेरा उन रास्तों को देख भागने जी करेगा जहां तुम कभी साथ होते थे।
क्या बस अफ़सोस ही जिंदा रहेगा ....ढेर सारे खालीपन लिए ...और तुम हमेशा के लिए दूर हो जाओगे ...
~दीपक

Friday, 2 August 2019

गलती के आंसू..

वह एक गलती करके रोना चाहती थी लेकिन मुझे उसके आँसू नहीं देखने थे । मैं नहीं चाहता था कि वह ऐसी कोई गलती करे जिसमें मैं साथ देकर अपने लिए खुशियां का इनाम पा जाऊं और उसके हिस्से में ढेर सारे आँसू छोड़ दूं। लेकिन वह जिद्दी निकली उसे गलती करने के लिए उसका मन उकसा रहा था । 

एक रोज किसी और ने उसे ढूंढ लिया जिसे उसकी गलतियों का इनाम मिल सके । वह उसके साथ जाने को कैसे तैयार हुई मुझे आज तक पता नहीं लेकिन उसके जाते ही ढेर सारे आंसू बादल बन गए। ये आसूं उसके थे या मेरे या शायद हम दोनों के मुझे ये भी पता नहीं। ये बादल मेरे खयालो की गहराइयों तक छिप गए हैं । जब तब घटा जोर की छा जाती है लेकिन ये अब भी बरसती नहीं ...तब ऐसा लगता है ये किसी गलती का इंतजार कर रहे हैं । 
~दीपक