Thursday, 18 February 2021

मैं वक्त के साथ बँटता जा रहा हूँ ....

अक्सर मुझे लगता है की मैं वक्त के साथ बँटता जा रहा हूँ , अनेकों हिस्सों में । कभी कभी मुझे डर लगता है कि मैं शायद इस जन्म में समूचा किसी का हो ही नहीं पाऊंगा । पता है जब तुम थी तो मैं पूरा था; अपनेआप में भी और तुम्हारे लिए भी लेकिन जब से तुम गयी, मेरे भीतर अधूरापन गहराता गया और किसी पूरेपन की तलाश में मैं बंटता गया। मुझे लगता है कि किसी का पूरा हो जाने के लिए उस पर पूरा विश्वास करना पड़ता है और अब मैं किसी पर पूरा विश्वास नहीं कर पाता हूँ शायद इसीलिये मैं समूचा किसी का हो नहीं पाया। ऐसा नहीं है कि मैंने फिर किसी से जुड़ने की कोशिश नहीं की पर जुड़ाव की कड़ी में फिर भरोसे की कमी आड़े आने लगती है और मेरा जुड़ाव पूर्ण समर्पण की बजाय एक औपचारिकता भर रह जाता है । जहां फिक्रमंदी तो होती है, थोड़े एहसास भी होते हैं लेकिन मैं वक्त नहीं देना चाहता और वक्त की कमी रिश्ते को नीरस बना देती है और एक नीरस रिश्ता धीरे धीरे बोझिल होता जाता है । कभी कभी मुझे लगता है कि अब मैं स्वार्थी और चालाक होता जा रहा हूँ । फायदे और नुकसान के गणित के सहारे मैं नए रिश्तों को तौलता रहता हूँ । अतीत की तलाश में यहां वहां भटकता रहता हूँ और बँटता रहता हूँ थोड़ा किसी के लिए ...तो थोड़ा किसी और के लिए ....
~दीपक

Tuesday, 3 November 2020

एक दूसरे की जरुरत बनते-बनते एक दूसरे की आदत बन गए...

अक्टूबर महीने के आखिरी दिन थे । सर्दियाँ ठंडी हवाओं के सहारे दस्तक दे चुकी थी । दिन ब दिन शामें ठंडी होती जा रही थी और इन्ही ठंडी शामों में हम एक दूसरे के करीब आते, एक दूसरे को प्यार करना सीख रहे थे । कभी हाथ में हाथ डाले दूर तक चलते हुए एक दूजे की छोटी छोटी खुशियों के बहाने ढूंढते, किसी सुबह चाय की चुस्कियों के साथ पौधों पर फैली ओंस को निहारते हुये, कभी गुनगुनी धूप सेंकते एक दूजे के स्पर्श को महसूस करते हुए तो कभी पार्क में खेलती किसी बच्ची की खिलखिलाहट में गुम होते हुए ... हमें पता भी नही चला कि कैसे हम एक दूसरे की जरुरत बनते-बनते एक दूसरे की आदत बन गए । यह आदत अच्छी थी या बुरी इसका फैसला शायद हम करना नहीं चाहते थे। हम एक दूसरे के साथ होते तो ऐसी बहुत सी आवश्यक बातें भूल जाते थे । चाय का बहाना बना जब हम हर शाम मिलते तो अपने सपनों की बातें करते, हाईवे पर दौड़ती गाड़ियों को देख अपने आउटस्टेशन ट्रिप का प्लान बनाते, आसमान में करीब आते चाँद और किसी सितारें को देख थोड़ी के लिए ही सही अपनी मुस्कुराहट को अपने चहेरे पर थाम लेते । 
To be continued...
~Deepak

Thursday, 10 September 2020

पहाड़ों से कुछ मांगों तो वो मिल जाता है न?

यह मसूरी में हमारा तीसरा दिन था । बिना किसी को बताए या यूं कहूँ कि अपनी वो रोज रोज वाली दुनिया से दूर हम बादलों के बीच थोड़े वक्त के लिए भटकने चले आये थे । वास्तव में ये आईडिया उसका ही था । हम अब तक वीकेंड्स पर दिल्ली के कोने कोने घूम लेने के बाद मुगलों और बाद में ब्रिटिश के बसाये इस शहर से ऊब से गए थे ।
ठंडी ठंडी हवाओं का सहारा लिए बादल उड़ते जा रहे थे । मौसम की खुशमिजाज़ी ऐसी थी कि किसी को भी अपने आकर्षण में बांध सकती थी ।
सुबह से ही आज वह बड़ी शांत लग थी । उसकी चंचल आँखें बड़ी देर ठिठकी पहाड़ों के उस पार ताक रही थी । अचानक वह बोली
: "पहाड़ों से कुछ मांगों तो वो मिल जाता है न? "
: "हाँ शायद ।" मैंने थोड़ी बेपरवाही में जवाब दिया । "लेकिन चुप होकर नहीं चिल्ला कर मांगना पड़ता है" मैंने उसे छेड़ने के अंदाज़ में यूं ही बोल दिया ।
: "क्यूँ ...ये तो इतने विशाल हैं ..क्या ये हमारे मन की बातें नहीं सुन पाते ?"
: "जी ...नहीं ...ये उन्हीं आवाजों को सुनते हैं जो इन तक पहुँच पाती है ...और फिर उन्हीं ख्वाहिशों को पूरा भी करते हैं जिनमें इन्हें सच्चाई और ईमानदारी दिखती है ।" मैंने एक बच्चे को समझाने के अंदाज़ में जवाब दिया ।
उसने आगे कुछ पूछा नहीं, बस पहाड़ों को ताकती रही। ऐसा लग रहा था जैसे पिछली रात देखा कोई ख़्वाब उसकी आँखों में उतर आया था और वह इन ख्वाबों को इन विशाल पहाड़ों को सौंपकर एक उम्मीद के सहारे बाकी की ज़िंदगी खुश और बेपरवाह रहना चाहती थी ....

Sunday, 2 August 2020

जवानी से बचपन का सफर...


शहर से गाँव जाना मेरे लिए जवानी से बचपन का सफर तय करने जैसा होता है ।
बचपन जिंदगी का वह हिस्सा जहाँ हुड़दंगई और बेफिक्री के साथ साथ हमारे खुद के कई मासूम सवाल होते हैं । कुछ के जवाब अपने मम्मा पापा दादी नानी और साथ के दोस्तों से जान पाते हैं और कुछ अन्तचित्त में कहीं दबे रह जाते हैं ।
ऐसे ही कुछ ख्वाहिशें भी होती हैं जो कहीं सिनेमा देखकर या कहानिया पढ़कर अलग अलग आकार लेकर पलती बढ़ती है ।
मुझे याद है मेरा बड़ा मन होता काश मेरे गाँव में भी एक नदी और एक छोटा सा रेलवे स्टेशन होता । अब ये बात सोचता हूँ तो बड़ी हंसी आती है । उस गुल्ली डंडे के ज़माने में नदी और रैलवेस्टेशन से क्या मतलब ।
पर बचपन तो बचपन होता है ; आजाद , बेफिक्र , नटखट , चंचल और मासूम ...
~दीपक

Thursday, 28 May 2020

प्यार में डूबी एक सुबह का मुकम्मल हो जाना ....

असह्य गर्मी के बाद
 बारिश की बूदों 
और 
ठंडी ठंडी हवावों में लिपटा सुकून । 
अपनी कल्पना में हकीकत की हद तक
मेरा तुम्हें महसूस करना।

 एक ऐसे ही सुकून भरे मौसम में
 तुम्हारा हाथ थामें दूर तक चलते जाना । 
एक दूसरे को देख के हौले से मुस्कराना और
 उस मुस्कराहट का बारिश की नन्ही नन्ही बूदों में घुलकर 
हमें अंदर तक सराबोर कर देना । 
ठंडी हवावों के आगोश में बंधे 
हमारा देर तक भीगते रह जाना । 

उस मनचली शाम का ढल जाना 
बादलों की ओट में छिपे
चाँद का निकल आना 
रात के अंधेरें में हमारा एक दूजे में 
खोकर
प्यार में डूबी एक सुबह का 
मुकम्मल हो जाना ....

~दीपक

Saturday, 9 May 2020

कमियाँ और अच्छाइयां और ज़िन्दगी

हम इंसान हैं । हांड़-मांस के पुतले में गढ़े, भावनाओं से सिंचित। धरती की खरबों की आबादी के होते हुए भी हम, हमारा व्यक्तित्व कई मायनों में एक दूसरे से अलग है । हमारे जन्म से लेकर वर्तमान तक कई सारे पहलू हैं जो हमको प्रभावित करते हैं और दूसरे शब्दों में कहूँ तो हमारे व्यक्तित्व को आकार देते हैं । हम हर दिन अपने जीवन की होने वाली घटनाओं से बहुत सी बातें सीखते भी हैं और उनमें से बहुत सी बातें हमारे व्यवहार का निर्धारण भी करती है । हम सब कौशल, ज्ञान, किसी कार्य विशेष के लिए क्षमताओं, शारीरिक और मनोवैज्ञानिक स्थिरता की स्थिति इत्यादि में मजबूत या कमजोर, अच्छे या बुरे हो सकते है लेकिन एक सत्यता जो कभी हमारा पीछा नहीं छोड़ती वह यह है कि हम कभी पूर्ण नहीं होते । हम सबमें कुछ अच्छाइयां तो कुछ कमियां बनी रहती है । इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि हमें उन कमियों को दूर करने का प्रयास नहीं करना चाहिए इसका मतलब बस इतना सा है हमें अपनी अच्छाइयों के साथ अपनी बुराइयों को स्वीकार करना सीखना चाहिए । साथ ही साथ दूसरों के अंदर उनकी बुराइयों से परे उनकी अच्छाइयों को भी समझना और सम्मान देना चाहिए । 
किसी साथ रहने, साथ वक्त गुजारने के लिए जरूरी होता है एक दूसरे को समझना । एक दूसरे को मौके देना । अपनी किसी गलती के लिए माफी मांग लेना और औरों को माफ कर देना । प्यार की मिठास में ढेर सारी कड़वाहट घुल जाती है ..बस जरूरत होती है पहल करने की । 
~दीपक 

Wednesday, 6 May 2020

स्वाभिमान और रिश्तों का रंग ...

ज़िन्दगी में कई बार स्थितियाँ हमें  उहापोह के बीच ला खड़ा करती है । सामने कुछ रास्ते होते हैं और हम आत्मसम्मान, रिश्तों की अहमियत, और ऐसे ही न जाने कितने एहसासों से घिरा महसूस करने लगते हैं । वह आज काफी देर शांत बैठी रही । कभी पार्क की घास में अपने हाथों को ऐसे सहलाती जैसे प्यार से किसी को दुलार रहा हो और कई बार उन्हें नोचने लगती । हमेशा उसका मन पढ़ लेने वाला चिराग आज चुपचाप बस उसे देखे जा रहा था । वह समझ रहा था कि आज किसी द्वंद में घिरी मिनी रास्ते की तलाश कर रही है । अचानक उनसे चिराग को देख कुछ बोलना चाहा और  फिर सोचने लगी । थोड़ी देर बाद वह वापस चिराग की तरफ मुड़ी और बोली " अपने आत्मसम्मान, स्वाभिमान को रिश्तों के ऊपर कितनी तवज्जो देनी चाहिए चिराग ? "
एकाएक अपनी तरफ आये इस प्रश्न के लिए चिराग पूरी तरह तैयार नहीं था । वह थोड़ी देर चुप रहा । थोड़ी देर सोचने के बाद वह दूर तक जाती सड़क को देखते हुए बोलने लगा " मिनी स्वाभिमान मानव का एक गुण है, यह हमें आत्मगौरव और आत्मसम्मान का बोध कराता  है। यह ऐसा गुण है जो हमें जाग्रत करता है और अपने ऊपर भरोसा करने की शक्ति देता है । और रिश्ते, महीन धागों के समान एहसासों से जुड़े रिश्तें जीवन में रंग भरते हैं । हमें जीवन जीने का सलीका सिखाते है। रिश्ते जीवन के लिए बहुत अहम है । लेकिन जब इनमें टकराव की स्थिति आ जाय तो मेरा मानना है कि हमारे लिए सच और ईमानदारी की कसौटी पर इन्हें परखना जरूरी हो जाता है । क्योंकि सच हमेशा एक सा रहता है अडिग । और हमें यह बोध कराता है कि क्या रिश्तों का रंग फीका पड़ गया है या हम अपने अभिमान को हम स्वाभिमान समझने की भूल कर रहे हैं "।