Saturday, 28 September 2019

अफ़सोस

मुझे आज इस बात का बहुत अफ़सोस होता है कि हमने ये कभी क्यों नही सोचा की जब हम किसी वजह से दूर हो जाएंगे तो एक दूसरे की जिन्दगियों में हमारी वजूद क्या होगा । हम कैसे जता पाएंगे अपने दिलों के गहराई में उठते उस दर्द को जो इन ठंड हवावों के आगोश में और गहरा रहा होगा। तुम जब बहुत दूर हो जाओगे तो मैं कैसे बोल पाऊंगा थोड़ी देर के लिए मुझे तुम्हारी बाहों की गर्मी में अपने ढेर सारे आँसू उलेड़ देना है । मैं क्या करूँगा उन शामों की घेरती तन्हाई में जब हर अनजान शख्स में मुझे सर्फ तुम्हारा अक्स नजर आ रहा होगा । मैं क्या करूँगा जब तुम्हारा हाथ थाम के यूँ ही चलते रहने की तलब में मेरा उन रास्तों को देख भागने जी करेगा जहां तुम कभी साथ होते थे।
क्या बस अफ़सोस ही जिंदा रहेगा ....ढेर सारे खालीपन लिए ...और तुम हमेशा के लिए दूर हो जाओगे ...
~दीपक

Friday, 2 August 2019

गलती के आंसू..

वह एक गलती करके रोना चाहती थी लेकिन मुझे उसके आँसू नहीं देखने थे । मैं नहीं चाहता था कि वह ऐसी कोई गलती करे जिसमें मैं साथ देकर अपने लिए खुशियां का इनाम पा जाऊं और उसके हिस्से में ढेर सारे आँसू छोड़ दूं। लेकिन वह जिद्दी निकली उसे गलती करने के लिए उसका मन उकसा रहा था । 

एक रोज किसी और ने उसे ढूंढ लिया जिसे उसकी गलतियों का इनाम मिल सके । वह उसके साथ जाने को कैसे तैयार हुई मुझे आज तक पता नहीं लेकिन उसके जाते ही ढेर सारे आंसू बादल बन गए। ये आसूं उसके थे या मेरे या शायद हम दोनों के मुझे ये भी पता नहीं। ये बादल मेरे खयालो की गहराइयों तक छिप गए हैं । जब तब घटा जोर की छा जाती है लेकिन ये अब भी बरसती नहीं ...तब ऐसा लगता है ये किसी गलती का इंतजार कर रहे हैं । 
~दीपक

Wednesday, 24 July 2019

ठंडी हवावों का बंधन

जून के गर्मी भरे शुरुआती दिन थे। हम अब भी इंटर्नशिप की तलाश में intershala गाहें बेगाहें देखते रहते थे । आज सुबह सुबह एक कॉल आयी । हम दोनों को इंटर्नशीप के इंटरव्यू के लिए बुलाया गया था। दोपहर की गर्मी में वो होस्टल से मेरे फ्लैट के नीचे आ चुकी थी, आदतन आज भी थोड़ा देर हो गयी थी मुझसे। मैं आते ही तैयार था उसके गुस्से और प्यार वाली डांट के लिए, मुझे पता था अभी  मैं सब सही कर लूंगा । हुआ भी वैसे । हमने ऑटो लिया दिए गए पते को ढूढंने निकल गए । इंटरव्यू अच्छा हुआ और थोड़ी देर में हम फ्री हो गए । हमने GIP मॉल जाने का सोचा, जैसा कि हम स्टूडेंट लाइफ में अक्सर करते थे, मॉल में गर्मी से निजात मिल जाएगी और साथ में कुछ खाना पीना भी हो जाएगा क्योंकि अब तक भूख भी लगने लगी थी ।
मॉल में घण्टों इधर उधर घूमने, खाने पीने के बाद अब वापस लौटना था । शाम के साथ मौसम रुख़ बदल चुका था । हमने ऑटो लिया कि तभी जोरों की बारिश आ गयी । बारिश की नन्ही नन्ही ढेर सारी बूदें हवावों के सहारे हमें छू के गुजर रही थी।
उसने अपना सर मेरे कंधे पर टिका दिया । नोएडा की सकरी सड़को पर चलती गाड़ियों आस पास बैठे लोगों से बेखबर मैं हवा के हर ठंडे झोंके से उसे छिपा लेना चाहता था। वह किसी सोती बच्ची सी हवा के हर झोंके के साथ और सिमट सी जाती थी ।

हम कॉलेज पहुँच गए अब तक बारिश भी बिल्कुल हल्की हो चुकी थी । हमने जाने से अपने स्पेशल टपरी से चाय पीने की सोची । स्पेशल इसलिये क्योंकि उस टपरी से हमारी ढेर सारी यादें जुड़ी है, ऊँची ऊँची बिल्डिंग्स के नीचे एक कोने में बिहार के किसी गांव से आये एक भैया वहां चाय बनाते थे ।  वह जगह ऐसी थी कि शायद कोई चाय पीने के लिए किलोमीटर भर पैदल चलता और वहां जाता सो वह हम लोगों की सीक्रेट जगह बन गयी थी । चाय वाले भैया हमारे लिए स्पेशल चाय बनाते और हम इस बीच ढेर सारी बातें करते । आज हम चुप थे। बड़ी देर तक वह मेरे कंधे पर सर टिकाये बैठी रही । मैं कभी कभी उसके बालों में हाथ फेरता तो वह और सिमट जाती । ठंडी हवावों के हर झोंके साथ हम गुम होते जा रहे थे । हमनें चाय पी और एक दूसरे का हाथ थामे पैदल ही गर्ल्स हॉस्टल की तरफ चलने लगे । अचानक हम रुक गए,  हमारे हाथों पकड़ कमजोर हो गयी, ऊँची ऊँची बिल्डिंग्स की ढेर सारे खिड़कियों से अनजान हम अब एक दूसरे की बाहों में थे । हम एक दूसरे को आज जी भर के गले लगाना चाहते थे । बारिश बन्द हो गयी थी लेकिन ठंडी हवा हमें बाँध रही,उस अनजाने से रिश्तें में जो एक दिन टूटने वाला था ।
(लिखी जा रही  कहानी का कुछ अंश)
~दीपक

Wednesday, 10 July 2019

बचपन, गाँव और बारिश..

अतीत और खास कर बचपन से जुड़ी बातें जब जेहन में आती है तो एक अजीब सी मुस्कराहट होठों पर छोड़ जाती है । आज जब शहर में बारिश को तरसता हूँ या बारिश को सीसे के उस पार से देखता हूँ तो मुझे वो बचपन और गाँव वाली बारिश याद आती है ।
बारिश के दिन की सबसे अच्छी बात ये होती थी उस दिन हम नेशनल हॉलिडे डिक्लेरेयर कर देते थे मतलब कि उस दिन बिना किसी और बहाने के दिन भर बिना अम्मा पापा के स्कूल न जाने के लिये डांट के, पूरा दिन मौज किया जा सकता था।
कभी कभी बारिश इतनी तेज होती कि घर से बाहर नहीं निकल सकते ऐसे में पूरा परिवार साथ बैठता । कभी कभी पड़ोस से कोई आ जाता और बातचीत की महफ़िल जम जाती । ऐसे में अक्सर पापा पकौड़ियों की फरमाइश करते और हम अंदर ही अंदर खुश हो जाते। अब पापा घर रहते तो सुरक्षात्मक कारणों से दिखाने के लिए ही सही पर किताबें कापियाँ भी खुली रखी जाती थी लेकिन बड़ी दीदी जब तक पकौड़ियाँ बना नही लेती हम एक दो चक्कर किचेन के लगा आते थे ।
घर पर बनी गरमा गरम पकौड़ियाँ साथ में चाय और  बाहर झमाझम बारिश, आज सब धुंधला ही सही, याद आता है तो मन उसी में खो सा जाता है ।


मझली दीदी हमें कागजों वाली नावँ बनाना सिखाती और  जैसे ही बारिश थमती हम अपनी अपनी नावँ लिए पास के तालाब पहुँच जाते । हम इस उम्मीद में नावँ तालाब में छोड़ते कि यह तैरते तैरते उस पार पहुँच जायेगी । अक्सर इस बात पर शर्त भी लगती । कभी कभी एक्सपेरिमेंट के तौर पर नावँ पर चीटें भी बैठाये जाते, ऐसा मानना था कि ये नावँ ढूबने नहीं देंगे और हम शर्त जीत जायेंगे । लेकिन वे तेज पानी के बहाव को नही सह पाती और शायद ही कोई नावँ उस पर तक पहुँच पाती ।
बारिश के साथ तालाब किनारे नए नए निकल आये पीले पीले मेढ़क भी बड़े कौतूहल के विषय होते, हम पापा के बताए इस बात पर कम भरोशा कर पाते थे कि कुछ दिनों पहले की चिलचिलाती धूप में ये जमीन के अंदर छिपे थे सो अक्सर इसको लेकर हम अपने अपने काल्पनिक ज्ञान साझा करते ।
गाँव में बारिश के दिन आसान नहीं होते थे, आसपास पानी भर जाना, जलावन की लकड़ियों की किल्लत, जानवरों के चारे और रहने की दिक्कतें सो अलग लेकिन हम बच्चें थे और अम्मा पापा सारी दिक्कतें अपने ऊपर समेत लेते थे ।

Monday, 1 July 2019

अधूरापन

उसके जाने के बाद से मेरे जीवन में एक अजीब सा अधूरापन घर कर गया है । मैं अक्सर तरकीबें सोचता हूँ  और अलग अलग तरीकों से उस अधूरेपन, उस खाली कोने को भरने की कोशिश करता हूँ पर जब अपनेआप में वापस लौटता हूँ तो वह कोना जस का तस बना मिलता है खाली, एक अजीब सी खामोशी ओढ़े । हमारी जिंदगियों में कभी कभी कुछ ऐसा हो जाता है जिसकी वजहें हमें लाख सोचने के बाद भी समझ नहीं आती । कभी कभी लगता हैं कि सड़क सपाट हो तो चलने में बोरियत हो जाएगी कुछ बाधाएं जरूरी है रफ्तार की तारतम्यता और अन्तःकरण की चेतना के लिए फिर लगता है कि क्या ये बाधाएं इतनी गहरी होनी चाहिए कि इनसे उबरना मुश्किल हो जाय?
बहुत सोचने पर लगता है हर बाधा अपनेआप में कुछ सीखे लिए होती है और शायद इनकी गहराई भी उन्ही के अनुपात कम या ज्यादा होती जाती है ।
पता है तुम्हारे जाने के बाद से दुनिया के लिए मेरा नजरिया बदल गया है । अब किसी पर भरोसा बढ़ने लगे तो एक अजीब सा डर आने लगता है मेरे अंदर । अब उजाले का लबादा ओढ़े दुनिया का ढेर सारा अंधकार मुझे दिन में भी दिखाई दे जाता है । अब किसी के चेहरे की मासूमियत मेरे दिल में पिघलने भर का आघात नहीं कर पाती । कभी कभी मुझे लगता है अब मेरा बच्चों वाला दिल; चालाक और समझदार दिमाग की बातें सुनने लगा है ...
(लिखी जा रही कहानी "मेरी ज़िन्दगी मेरा प्यार" का कुछ अंश)
~दीपक

Wednesday, 5 June 2019

साम्य कहीं बंधन न बन जाय..

उतार चढ़ाव भरी ज़िन्दगी को देख अक्सर कुछ लोगों का कहना याद आता है क्यूं न हमेशा साम्य में जिया जाय; खुशियों की न बहुत खुशी और गम में न बहुत गम । फिर लगता है ये साम्य कहीं बंधन न बन जाय क्योंकि एक सोच ये भी कहती है कि जिंदगी को स्वक्षन्द होकर जिये, खुशियों में जी भर के खुशियां मनाए और गम के दिनों में शोक भी मनाये, उसे भी महसूस करें । मुझे ऐसा लगता है कभी कभी हम इन दो पहलुओं में उलझते जरूर होंगे। जब मैं किसी योगी के जीवन को देखता हूँ तो उसमें मुझे पहले पहलू का आचरण दिखता है, एक अनोखा साम्य जिसे परिस्थितियां ज्यादा प्रभावित नहीं कर पाती और कुछ जिंदगियां ऐसी भी हैं जिनमें दूसरे पहलू का अक्स दिखता है; पूर्णतया परिस्थितिजन्य । लेकिन मुझे लगता है अंत में ये दोनो पहलू एक हो जाते है जो साम्य को धारण करने, बनाये रखने में सक्षम है वो साम्य में बना रहता है बाकियों को वक्त अपनी रफ्तार के साथ उतार चढ़ाव के बीच आगे बढ़ाता रहता है ।
~दीपक

Saturday, 4 August 2018

दुनिया दोस्तों की..........

माँ की गोद से उतरा तो परिवार का साथ मिला। जहाँ घर की चहारदीवारी मेँ एक दुनिया बसती थी, मेरे अपनो की। जहाँ तोतली आवाज मे मैने बोलना सीखा, गिरते, लड़खड़ाते अपने नन्हे पैरो पर खुद को सम्भालना सीखा ।
एक पँछी जिसने हाल ही मेँ उड़ना सीखा है और अपने नये उत्साह और उमंग के बूते ऊँचे आसमाँ मे उड़ने के सपने बुनता है उसी भाँति मै भी अपने पैरो पर चलते एक नये दुनिया मेँ निकल पड़ा- मेरे दोस्तो की दुनिया।


मेरे बचपन से जवानी तक साथ देते मेरे हमसफर साथियो की दुनिया।
जिनके साथ मैने कभी गुल्ली डण्डे कभी आँख-मिचौली कभी चोर-पुलिस के खेल खेले ।
जिनके साथ कागज की नाँव पर बैठ समन्दर पार करने के सपने देखे।
जिनके साथ हँसता-खेलता मेरा बचपन बीता।
थोड़े बड़े हुए तो इन्ही के साथ लकड़ी की स्लेट और स्याही थामे अपने विद्यालय की डगर पहचाना।
अब मै एक नयी जगह था जहाँ मै मेरी स्लेट पर उकेर कर बनाये गये अनजान शब्दोँ के साथ मै कई अनजान चेहरो से भी मिला । जो आज मेरे अपने बन चुके शब्दो की भाँति मेरे जाने पहचाने मेरे अपने बन गये है।

घर पर मेरे अपने थे जिनसे मेरा खून का रिश्ता था जिन रिश्तो के कई नाम भी थे और बाहर मेरे दोस्तोँ का साथ । इन सबसे मेरा खून का रिश्ता नही था और न ही इनसे रिश्ते का अलग-अलग नाम ही था पर इनसे मेरा लगाव ,मेरा अपनापन मेरे खून के रिश्तो से कम न था।
आज भी बिना इनके मेरी महफिले, मेरी खुशियाँ मेरी हँसी अधूरी होती है। कभी हम एक -दूसरे पर हँसते है , एक दूसरे को चिढ़ाते है पर कुछ भी हो हम एक दूसरे की आँखोँ मे आसूँ नहीँ देख सकते है। 
हम एक दूसरे से नाराज भी होते है पर हमारा दिल ज्यादा दिनोँ तक दूरी बर्दाश्त नहीँ कर पाता और फिर हम बीती कड़वी बातोँ को भूल एक हो जाते है। खुशियो के पल हम साथ मिल कर बिताते है और जो दुख की घड़ी किसी एक पर भी आती है तो हम सबके कन्धे सहारे के लिए तैयार मिलते है।


दोस्त बहुत ही अनमोल होते है। आज के समय मे कई लोग एक दूसरे को दोस्त तो कहते है मगर समय आने पर दोस्ती के पवित्र रिश्ते की धज्जियाँ उड़ाने से नहीँ चूकते।
मै जब भी अकेला होता हूँ मुझे अपने दोस्तो का महत्व बखूबी समझ आ जाता है।
मैने उनसे बहुत कुछ सीखा है इस बात की हकीकत मै स्वीकार करता हूँ।
मुझे अपने दोस्तो पर गर्व है। मै अपने सभी दोस्तो को तहे दिल से शुकरिया अदा करता हूँ उनके अतुल्य प्यार , साथ और सम्मान के लिए।

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दीपक त्रिपाठी