Sunday, 14 September 2025

उसका नाम, उसका चेहरा, और उसकी अंदरूनी महक

और कुछ है जो वापस लौट आता है । हर बार कोई नया रूप धरकर । कभी उसके शहर में न रहते हुए भी; और उसके शहर में पहुंचने के बाद तो क्या ही कहने । मुझे कभी कभी लगता है उसका नाम, उसका चेहरा, और उसकी अंदरूनी महक; मेरे शरीर के भीतर कहीं चिपक गई है । वह पल अपने पूरे वजूद के साथ उभर आता हैं जब हम एक दूसरे की महक में डूबे पूरे के पूरे दिन और शामें गुजार देते थे । ऐसे दौर में कुछ अतीत के दिन जिंदा शक्ल लिए आस पास भटकने लगते है । 
मैं बकार्डी के चार पैग लगा कर एक बढ़िया माहौल के साथ वूफर पर बज रहे ग़ज़ल का आनंद ले रहा था । खिड़की के बाहर हल्की बारिश से हवाएं छन-छनकर माहौल में एक अजीब सी रोमानियत घोल रही थीं। डोर वेल बजा । मैंने गुनगुनाते हुए दरवाजा खोला। सुबह सुबह खिल आए एक फूल सी ताजगी लिए अगले पल वो मेरी बाहों में थी । एक अजीब से आकर्षण ने हमारे होठों को आपस में बांध दिया था । थोड़ी ही देर में उसकी अंदरूनी महक ने मुझे अपने कब्जे में ले लिया था । लैटिन अमेरिकी रम के नशे पर एक दूसरा नशा भारी पड़ रहा था । जितनी भी चीजें हमारे बीच थी धीरे धीरे करके दूर होती गई । मैने अपने आपको उसके बाहों के बीच निढाल छोड़ दिया । 
हम एक दूसरे में खोए रहे । बैकग्राउंड में संगीत बजता रहा । उन कई घंटों में मेरे लिए दुनिया उसके आलिंगन में सिमट गई थी । उसकी महक के साथ साथ उसके शरीर की गर्मी; मै बहुत अंदर तक महसूस कर रहा था । उसके होठों की लालिमा मेरे होठों में उतर आई थी ।उस दिन ज्यादा बातें नहीं हुई ।
शाम ढल आई । उसके वापस लौट जाने का वक्त आ गया । न मै उसे जाने देने चाहता था और न वह जाना चाहती थी । हम दोनों उस रोज दुनिया भर की घड़ियां को रोक देना चाहते थे । लेकिन वक्त रुका नहीं ...उसे जाना ही पड़ा । लेकिन जाते जाते मेरे अंदरूनी हिस्से में कुछ ऐसा छोड़ दिया जो एक मीठे दर्द के रूप में आज भी यदा कदा उभर ही आता है ।
~दीपक

Saturday, 23 August 2025

"कॉफ़ी, बारिश और वो"

अकेला मैं… हाथ में एक स्ट्रॉन्ग कॉफ़ी का कप। बालकनी से झरती हल्की-हल्की बूंदें जैसे किसी पुरानी याद को ताज़ा कर रही थीं। गमलों में लगे पौधों की पत्तियाँ हर बूँद के साथ चमक उठतीं, और मैं उस चमक में अतीत की परछाइयाँ ढूँढने लगता।

पीछे धीमी आवाज़ में जगजीत सिंह की ग़ज़ल बज रही थी— "होशवालों को खबर क्या..."और तभी, उस नमी भरी हवा में एक ख़ुशबू घुल गई।

मैंने मुड़कर देखा...वो खड़ी थी, भीगी हुई साड़ी में, आँखों में वही चमक और शरारत जो कभी लखनऊ के इको पार्क में घूमते हुए उसकी आंखों में दिखाई देती थी ।

“तुम यहाँ? इतने साल बाद…?”

उसने मुस्कुराकर कहा...“कॉफ़ी अब भी स्ट्रॉन्ग ही बनाते हो… या बदल गए हो?”

मैं कुछ बोलता, उससे पहले ही उसने आगे बढ़कर मेरे हाथ से कप ले लिया। एक घूंट लिया और बालकनी की रेलिंग पर झुक गई। बारिश की बूंदें उसके बालों से फिसलकर उसकी गर्दन पर ठहर जातीं, और मैं बस उसे देखता रह गया। ग़ज़ल की आवाज़, बारिश की बूंदें और उसकी ख़ामोशी ... सब मिलकर एक अधूरी मोहब्बत की दास्तान कह रहे थे।

मैंने हिम्मत जुटाकर कहा...“तुमसे कितनी बार मिलने को कहा...तुम कभी मिले क्यों नहीं?”उसकी आँखें भर आईं, लेकिन होंठों पर अब भी मुस्कान थी।“कभी-कभी प्यार को दूर हो जाना पड़ता है… ताकि यादें पास रह सकें।”

मुझे लगा जैसे समय थम गया हो। उस कॉफ़ी के कप से उठती भाप में, बारिश की ठंडी हवा में, और उस अधूरी मुस्कान में ... मैं अपनी पूरी ज़िंदगी देख रहा था।

बारिश और तेज़ हुई। उसने कॉफ़ी का आख़िरी घूंट लिया, कप मेरी ओर बढ़ाया और फुसफुसाकर बोली...“तुम्हारी कॉफ़ी अब भी वैसी ही है… बस मैं थोड़ी बदल गई हूँ।” 

और अगले ही पल, वो चली गई। बालकनी में बस खाली कप रह गया, और मैं…बरसती बूंदों में घुली उसकी यादें पीता रह गया।

~दीपक

Friday, 1 August 2025

"कुछ सवाल अधूरे, कुछ खामोश जवाब"



"मिलोगे?"
एक सीधा-सा सवाल था वो, पर उसके पीछे एक इंतज़ार था, एक चाह थी, और शायद एक आखिरी उम्मीद भी।

चिराग़ ने ये सवाल इसलिए नहीं पूछा था कि उन्हें जवाब चाहिए था, बल्कि इसलिए पूछा था कि शायद इस बार जवाब कुछ और हो… शायद इस बार सामने वाला कह दे, "हां, मिलते हैं।"

लेकिन दिव्या का जवाब सीधा था ...
“हर बार मना करने के बाद भी आप क्यों पूछते हैं मुझसे?”
उसके शब्दों में झुंझलाहट नहीं थी, लेकिन एक उलझन थी कि जब न मिलना तय हो गया है, तो फिर मिलने की बात क्यों?

चिराग़ ने बस "ओके" कहकर बात खत्म करनी चाही, पर दिव्या फिर खुद ही पूछ बैठी –
"क्या ओके... मैं बस पूछ रही थी।"

उसने भी शायद दिल से समझा कि चिराग़ का सवाल यूँ ही नहीं था। लेकिन चिराग़ जान चुका था कि अब इस सवाल के जवाब में वही पुराना सन्नाटा मिलेगा। इसलिए उसने खुद से कहा “इसके पीछे का कारण शायद मैं समझ नहीं पाऊं।”

और फिर अगली सुबह ...
एक लंबा, भावनाओं से भरा संदेश, जो चिराग़ ने दिल से लिखा ...
“Don’t worry… ये आखिरी बार था।
शायद तुम कहीं ज्यादा व्यस्त हो, या शायद अब तुम्हारे मन में मेरे लिए पहले जैसा कुछ भी नहीं रहा। मैंने कोशिश की, क्योंकि ये रिश्ता मेरे लिए मायने रखता है। लेकिन अब मैं तुम्हें स्पेस देता हूं… क्योंकि बार-बार दरवाज़ा खटखटाना तब ठीक नहीं होता जब सामने वाला दरवाज़ा खोलना ही नहीं चाहता।
ख़्याल रखना।”

ये शब्द सिर्फ विदाई नहीं थे, ये एक थके हुए दिल की आखिरी आवाज़ थी। लेकिन कहानी का मोड़ वहीं से शुरू हुआ।
दिव्या का जवाब आया ...
 “मैंने सच में बहुत कोशिश की आपको भुला दूं… लेकिन कहीं न कहीं वो चीज़ हमेशा रहती है अंदर। I do miss you always 🙂”

"याद आती है आपकी बहुत..."

ये वो भावनाएं थीं, जो शायद बहुत पहले कही जानी चाहिए थीं, लेकिन किसी द्वंद्व, किसी उलझन, या ईगो के आगे दब गईं थीं। अब जब चिराग़ ने पीछे हट रहा था .... शायद दिव्या को महसूस हुआ हो कि जो पीछे खड़ा था हमेशा ...हर बार मिलने के बहाने खोजता था ...अब शायद वो चला जाएगा।

चिराग़ का जवाब भी एकदम सच्चा था ...
"Same here 😔"

दोनों ने एक-दूसरे को मिस किया, एक-दूसरे की यादों में जिया, लेकिन मुलाक़ात नहीं हो पाई।

यह कहानी उन रिश्तों की है...
जहां लोग एक-दूसरे से बेहद जुड़े होते हैं,
लेकिन समय, हालात, या शायद कुछ न कहा गया डर; उन्हें दूर कर देता है।
जहां प्यार तो होता है, लेकिन साथ नहीं। जहां बातों से ज़्यादा ख़ामोशियां बोलती हैं, और कभी-कभी सबसे गहरी बातें वहीं छुपी होती हैं, जहां दो शब्द भी कहे नहीं जाते।

शायद किसी और जन्म में,
किसी और वक़्त में,
किसी और मोड़ पर
ये अधूरी कहानी पूरी हो।

पर फिलहाल, यही सच्चाई है –
"कभी-कभी हम सबसे ज़्यादा उन्हीं को याद करते हैं,
जिनसे मिलना अब मुमकिन नहीं होता।"
~दीपक


Saturday, 5 July 2025

कितनी सारी बातें रह गई....

चाचा को गए लगभग साल भर हो गए । पिछले कुछ दिनों से उनकी स्मृति एकाएक उभर सी आई है । मन हर बार उसी अमरूद के पेड़ के नीचे जा रहा जहां गर्मी के दिनों में दोपहरी और शाम में चाचा किताब पढ़ते मिल जाते थे । उनकी याद आते ही एक अजीब सा अधूरापन सा महसूस होता है । लगता है कितना कुछ साथ जिया जाना अभी रह गया था । 
हमारी कभी फोन पर बात नहीं होती थी लेकिन जब भी घर जाता, उन्हें एक किताब का इंतजार ज़रूर रहता था । मैं अक्सर सोचता था एक दिन अपनी लिखी कोई किताब जब इन्हें दूंगा तो कितना अच्छा लगेगा । 
 कितनी सारी बातें रह गई । यह सब लिखते हुए बार बार मै अजीब सी पीड़ा अनुभव कर रहा हूं । किसी के चले जाने के बाद ही इतना सब अनुभव क्यों होता है । किसी अपने को अलविदा कह पाना बहुत कठिन है । शायद समय का सबसे बड़ा छल यही है कि वह हमें ये कभी नहीं बताता कि कौन सी मुलाकात आख़िरी है ।
~दीपक  

Thursday, 15 May 2025

मनचाही खुशबू और फूल

ऐसे कई सारे फूल हैं जो मुझे आकर्षित कर रहे हैं । लेकिन पास जाने पर मुझे मनचाही खुशबू नहीं मिल रही नहीं । कुछ फूल नए हैं तो कुछ पुराने । मैं अपनी बालकनी को गुलजार तो देखना चाहता हूं लेकिन एक साथ ढेर सारा नयापन मैं संभाल नहीं पाता और पुराने फूलों में अब वो खुशबू नहीं रह गई है। 

मैं सपने देखता हूं एक ऐसे फूल की जिसे मैं देर तक निहार सकूं जिसकी सुंदरता ढल जाने के बाद भी उसकी पंखुड़ियों को अपने पसंदीदा किताब के पन्नों के बीच सहेज कर रख सकूं । कभी कभी मैं आत्मसंदेह की स्थिति से भर जाता हूं । कई बार फूलों के प्रति अपने आकर्षण से मै लड़ता भी हूं । अपनी खुशियों के इतने सापेक्षिक होने पर मुझे चिढ़ होने लगी है....

~दीपक

Sunday, 4 May 2025

जीवन, सम्बन्ध और भावनात्मक जुड़ाव

जीवन में सम्बन्ध सिर्फ तर्क आधारित नहीं हो सकते हैं । गहराई में देखने पर भावनाऐं कई मायनों में जीने का आधार बनती है । हर किसी का व्यक्तित्व कम ज्यादा अनुपात में अच्छाइयों और बुराइयों से मिलकर ही बनता है । किसी की उपस्थिति का मायना उसके अनुपस्थिति में ज्यादा समझ आता है । मुझे नहीं पता यह वर्तमान दुनिया के लिए कितना सही है या नहीं पर मुझे लगता है जुड़ाव का असल मतलब भावनात्मक जुड़ाव ही है । 

Tuesday, 8 April 2025

एक भुरभुरी सी मेड़ और उसके आर पार खड़े हम दोनों ...

हम दोनों एक मेड़ के दोनों तरफ खड़े हैं । अपने कमजोर पलों में अक्सर जब हमारे संवेदनाओं का ज्वार चढ़ता है तो लगता है कि वह मेड़ अब भरभरा जाएगी । लेकिन ऐसे पलों में हम से कोई एक मजबूत बनकर उसे संभाल लेता है । मेरे अंदर इतनी मजबूती नहीं अक्सर यह जिम्मेदारी भी वही निभाती है । अपने शुरूआती दिनों से ही परिस्थितियों ने उसे ऐसे ढाला है कि वह जिम्मेदार होती चली आई है । हमारे रिश्ते को भी उसने ही संभाला था । और एक रोज जब उसको लगा कि यह साथ अब इस रिश्ते की कुर्बानी से ही बचा रह सकता है तो इसमें भी पहला मजबूत कदम उसी ने उठाया । वह बाहर से जितनी मजबूत दिख रही है वह अंदर से उतनी ही कोमल है, सौम्य है यह बात तो मैं पूरे दावे के साथ कह सकता हूं । मैं अक्सर सोचता हूं कि हमारे साथ के दिनों की याद आने पर वह क्या करती होगी ? मैं मिलने पर उसकी टिमटिमाती आंखें पढ़ने की कोशिश करता हूं । लेकिन वह बुत सी नजर आती है जैसे उसने अकेले में अपने आपमें बहुत कुछ जज़्ब कर लिया हो । 

~दीपक