हमें अलग हुए महीनों हो गए । नहीं अब तो साल भी पूरा हो गया । उसे रोज़ याद करता हूं । नहीं रोज़ तो नहीं । लेकिन हाँ उसकी याद ऐसे आती है जैसे किसी मौसम के नजदीक आने पर उसकी खुशबू, तेज दोपहरी का तपता सूरज तो कभी बारिश के बाद की ठंडी हवाएं । उसकी गली से निकलता हूं तो उसका किराए का घर थोड़ा अपना लगता है । अकेला होता हूं तो एक नजर निहार के थोड़ा मुस्कुरा देता हूं । ऐसा लगता है इस घर के पहली मंजिल पर कुछ छोड़ आया हूं । नहीं नहीं जानबूझकर नहीं छोड़ा, कुछ खुद अपने आप से छूट गया हो जैसे ।
आज बिज़नेस शूट पहन रहा था । सब हो गया अब टाई बांधनी है । अब फिर से मुझे वो याद आ रही है । मैं टाई बांधना कॉलेज में भी नहीं सीख पाया । उससे मिलने के बाद तो मैने सोचा कि अब मैं टाई बांधना सीखूंगा ही नहीं । मुझे कहीं जाना होता वही टाई बांधती । बिल्कुल परफेक्ट। एकदम परफेक्ट नॉट, एकदम परफेक्ट लंबाई । वैसे मै बहुत चूजी नहीं हूं । लेकिन मुझे किसी और का बाँधा टाई कभी पसंद नहीं आया ...
~दीपक
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