यहाँ बातें करता हूँ मै कुछ दिली जज्बातों की , माझी की कुछ यादों की , राहों में ठिठके रह गए बेबस दरख्तों की , कुछ हर रोज जीते कुछ खट्ते मीठे एहसासों की .... . . बड़ा प्यारा लगता है मुझे ये एहसासों का कारवाँ....बस इन्हे शब्दों में ढालने की कला तलाश रहा हूँ....सच कहूँ अँधेरे में डूब चुकी कुछ अनजान बस्तियों के लिए रौशनी तलाश रहा हूँ .....
Saturday, 13 December 2025
बचपन की साथी ..जीवन में मेरी शिक्षक
मजबूरी जब घुटन बन जाती है...
Friday, 28 November 2025
अनकही मोहब्बत : एक अधूरी सी कहानी
Friday, 31 October 2025
अंधेरे का कैनवास
मै बहुत देर तक उस अंधेरे में नहीं रह पाता । मै अनंत तक सोच पाने को एक छोर ढूंढ लेता हूं । जैसे रात का अंधेरा नींद आते ही एक कैनवास बन जाता है और उस पर वो सारे चित्र उग आते हैं जिनसे मै उजाले में दूर भागता रहता हूं । मै अंधेरे से ज्यादा डरता हूं या अकेलेपन से; यह मै आज तक ठीक ठीक समझ नहीं पाया । कभी कभी मुझे सपने में एक फीके रंग की दुनिया दिखती है जिसमें रंगीन तितलियां इंसानों को देखकर भागती नहीं है । वो आपस में खूब बातें करते हैं । इंसान ढेर सारे फूल लगाकर तितलियों को संदेशा भेजते है । तितलियां दूर देश से आती है। तितलियां और इंसान जब साथ हंसते हैं तो एक नया संगीन सुनाई देता है । अंत में तितलियां इंसानों के साथ हमेशा के लिए बस जाती हैं और वह फीकी दुनिया एकाएक रंगीन हो जाती है ।
~दीपक
Sunday, 14 September 2025
उसका नाम, उसका चेहरा, और उसकी अंदरूनी महक
Saturday, 23 August 2025
"कॉफ़ी, बारिश और वो"
अकेला मैं… हाथ में एक स्ट्रॉन्ग कॉफ़ी का कप। बालकनी से झरती हल्की-हल्की बूंदें जैसे किसी पुरानी याद को ताज़ा कर रही थीं। गमलों में लगे पौधों की पत्तियाँ हर बूँद के साथ चमक उठतीं, और मैं उस चमक में अतीत की परछाइयाँ ढूँढने लगता।
पीछे धीमी आवाज़ में जगजीत सिंह की ग़ज़ल बज रही थी— "होशवालों को खबर क्या..."और तभी, उस नमी भरी हवा में एक ख़ुशबू घुल गई।
मैंने मुड़कर देखा...वो खड़ी थी, भीगी हुई साड़ी में, आँखों में वही चमक और शरारत जो कभी लखनऊ के इको पार्क में घूमते हुए उसकी आंखों में दिखाई देती थी ।
“तुम यहाँ? इतने साल बाद…?”
उसने मुस्कुराकर कहा...“कॉफ़ी अब भी स्ट्रॉन्ग ही बनाते हो… या बदल गए हो?”
मैं कुछ बोलता, उससे पहले ही उसने आगे बढ़कर मेरे हाथ से कप ले लिया। एक घूंट लिया और बालकनी की रेलिंग पर झुक गई। बारिश की बूंदें उसके बालों से फिसलकर उसकी गर्दन पर ठहर जातीं, और मैं बस उसे देखता रह गया। ग़ज़ल की आवाज़, बारिश की बूंदें और उसकी ख़ामोशी ... सब मिलकर एक अधूरी मोहब्बत की दास्तान कह रहे थे।
मैंने हिम्मत जुटाकर कहा...“तुमसे कितनी बार मिलने को कहा...तुम कभी मिले क्यों नहीं?”उसकी आँखें भर आईं, लेकिन होंठों पर अब भी मुस्कान थी।“कभी-कभी प्यार को दूर हो जाना पड़ता है… ताकि यादें पास रह सकें।”
मुझे लगा जैसे समय थम गया हो। उस कॉफ़ी के कप से उठती भाप में, बारिश की ठंडी हवा में, और उस अधूरी मुस्कान में ... मैं अपनी पूरी ज़िंदगी देख रहा था।
बारिश और तेज़ हुई। उसने कॉफ़ी का आख़िरी घूंट लिया, कप मेरी ओर बढ़ाया और फुसफुसाकर बोली...“तुम्हारी कॉफ़ी अब भी वैसी ही है… बस मैं थोड़ी बदल गई हूँ।”
और अगले ही पल, वो चली गई। बालकनी में बस खाली कप रह गया, और मैं…बरसती बूंदों में घुली उसकी यादें पीता रह गया।
~दीपक
Friday, 1 August 2025
"कुछ सवाल अधूरे, कुछ खामोश जवाब"
Saturday, 5 July 2025
कितनी सारी बातें रह गई....
Thursday, 15 May 2025
मनचाही खुशबू और फूल
ऐसे कई सारे फूल हैं जो मुझे आकर्षित कर रहे हैं । लेकिन पास जाने पर मुझे मनचाही खुशबू नहीं मिल रही नहीं । कुछ फूल नए हैं तो कुछ पुराने । मैं अपनी बालकनी को गुलजार तो देखना चाहता हूं लेकिन एक साथ ढेर सारा नयापन मैं संभाल नहीं पाता और पुराने फूलों में अब वो खुशबू नहीं रह गई है।
मैं सपने देखता हूं एक ऐसे फूल की जिसे मैं देर तक निहार सकूं जिसकी सुंदरता ढल जाने के बाद भी उसकी पंखुड़ियों को अपने पसंदीदा किताब के पन्नों के बीच सहेज कर रख सकूं । कभी कभी मैं आत्मसंदेह की स्थिति से भर जाता हूं । कई बार फूलों के प्रति अपने आकर्षण से मै लड़ता भी हूं । अपनी खुशियों के इतने सापेक्षिक होने पर मुझे चिढ़ होने लगी है....
~दीपक
Sunday, 4 May 2025
जीवन, सम्बन्ध और भावनात्मक जुड़ाव
Tuesday, 8 April 2025
एक भुरभुरी सी मेड़ और उसके आर पार खड़े हम दोनों ...
हम दोनों एक मेड़ के दोनों तरफ खड़े हैं । अपने कमजोर पलों में अक्सर जब हमारे संवेदनाओं का ज्वार चढ़ता है तो लगता है कि वह मेड़ अब भरभरा जाएगी । लेकिन ऐसे पलों में हम से कोई एक मजबूत बनकर उसे संभाल लेता है । मेरे अंदर इतनी मजबूती नहीं अक्सर यह जिम्मेदारी भी वही निभाती है । अपने शुरूआती दिनों से ही परिस्थितियों ने उसे ऐसे ढाला है कि वह जिम्मेदार होती चली आई है । हमारे रिश्ते को भी उसने ही संभाला था । और एक रोज जब उसको लगा कि यह साथ अब इस रिश्ते की कुर्बानी से ही बचा रह सकता है तो इसमें भी पहला मजबूत कदम उसी ने उठाया । वह बाहर से जितनी मजबूत दिख रही है वह अंदर से उतनी ही कोमल है, सौम्य है यह बात तो मैं पूरे दावे के साथ कह सकता हूं । मैं अक्सर सोचता हूं कि हमारे साथ के दिनों की याद आने पर वह क्या करती होगी ? मैं मिलने पर उसकी टिमटिमाती आंखें पढ़ने की कोशिश करता हूं । लेकिन वह बुत सी नजर आती है जैसे उसने अकेले में अपने आपमें बहुत कुछ जज़्ब कर लिया हो ।
~दीपक