Saturday, 13 December 2025

बचपन की साथी ..जीवन में मेरी शिक्षक

कभी-कभी कुछ गहरे भावनात्मक क्षणों में दिल में भरा ढेर सारा प्रेम, बिना आवाज़ किए, धीरे-धीरे आसूं बन जाना चाहता है।
 दीदी मुझसे उम्र में बस थोड़ी सी बड़ी हैं...पर जीवन के हर मोड़ पर उन्होंने मुझसे पहले कदम रखा। 
पहले अक्षर पहचाने, पहले पेंसिल सही पकड़ी, पहियों पर संतुलन बनाना भी मुझसे पहले उन्होंने ही सीखा ;चाहे वो A B C D हो या साइकिल का हैंडल पकड़कर पूरा जीवन चलाने का हुनर।

बचपन में हम दोनों के बीच काम बँटे थे —स्कूल जाते समय टिफ़िन दीदी ले जातीं, और वापसी में खाली टिफ़िन ढोना मेरे हिस्से आता।जाते समय कभी टिफ़िन खोया नहीं,पर लौटते समय मैं अक्सर टिफिन खो जाता…लेकिन हर बार दीदी की नज़र में शिकायत कम, जिम्मेदारी ज़्यादा दिखती। शायद उसी दिन से उन्होंने घर की, रिश्तों की, और मुझ जैसे छोटे से दुनिया की जिम्मेदारी अपने कंधों पर रख ली थी।

आज भी जब देखता हूँ उन्हें ....रिश्ते निभाते,सैकड़ों काम करते ,सबके बीच मुस्कान बाँटते हुए, खुद की थकान चार दीवारों में बंद करके,बीच-बीच में औरों के जीवन के लिए, सपनों के लिए वक्त निकालती हुई —तो मन कह उठता है…दीदी तो आज भी सीखने की, आगे बढ़ने की दौड़ में सबसे आगे ही हैं। बचपन की साथी आज भी जीवन में मेरी शिक्षक है —चाहे वो शब्दों की हो… भावनाओं की, या मजबूत बनने की।
~दीपक

मजबूरी जब घुटन बन जाती है...

मजबूर होना बहुत परेशान करता है।
और जब सामने कोई उसी मजबूरी का फायदा उठाने लगे,
और आप चाहकर भी कुछ न कर पाएं,
तो वही परेशानी धीरे-धीरे घुटन में बदल जाती है।
मन भारी हो जाता है,
और खामोशी अंदर ही अंदर शोर मचाने लगती है।

सबसे ज़्यादा तकलीफ़ तब होती है
जब इंसान दूसरों से नहीं,
खुद से चिढ़ने लगता है।
मन बार-बार सवाल करता है...
“अब तक ऐसा मुकाम क्यों हासिल नहीं कर पाया
कि अपनों का सहारा बन पाता?”

यह सवाल किसी और के ताने से ज़्यादा चुभता है।
क्योंकि इसमें उम्मीद भी होती है
और खुद से नाराज़गी भी।
लगता है जैसे मेहनत अधूरी रह गई हो,
जैसे सपने रास्ते में ही थक गए हों...

~दीपक