Saturday, 23 August 2025

"कॉफ़ी, बारिश और वो"

अकेला मैं… हाथ में एक स्ट्रॉन्ग कॉफ़ी का कप। बालकनी से झरती हल्की-हल्की बूंदें जैसे किसी पुरानी याद को ताज़ा कर रही थीं। गमलों में लगे पौधों की पत्तियाँ हर बूँद के साथ चमक उठतीं, और मैं उस चमक में अतीत की परछाइयाँ ढूँढने लगता।

पीछे धीमी आवाज़ में जगजीत सिंह की ग़ज़ल बज रही थी— "होशवालों को खबर क्या..."और तभी, उस नमी भरी हवा में एक ख़ुशबू घुल गई।

मैंने मुड़कर देखा...वो खड़ी थी, भीगी हुई साड़ी में, आँखों में वही चमक और शरारत जो कभी लखनऊ के इको पार्क में घूमते हुए उसकी आंखों में दिखाई देती थी ।

“तुम यहाँ? इतने साल बाद…?”

उसने मुस्कुराकर कहा...“कॉफ़ी अब भी स्ट्रॉन्ग ही बनाते हो… या बदल गए हो?”

मैं कुछ बोलता, उससे पहले ही उसने आगे बढ़कर मेरे हाथ से कप ले लिया। एक घूंट लिया और बालकनी की रेलिंग पर झुक गई। बारिश की बूंदें उसके बालों से फिसलकर उसकी गर्दन पर ठहर जातीं, और मैं बस उसे देखता रह गया। ग़ज़ल की आवाज़, बारिश की बूंदें और उसकी ख़ामोशी ... सब मिलकर एक अधूरी मोहब्बत की दास्तान कह रहे थे।

मैंने हिम्मत जुटाकर कहा...“तुमसे कितनी बार मिलने को कहा...तुम कभी मिले क्यों नहीं?”उसकी आँखें भर आईं, लेकिन होंठों पर अब भी मुस्कान थी।“कभी-कभी प्यार को दूर हो जाना पड़ता है… ताकि यादें पास रह सकें।

मुझे लगा जैसे समय थम गया हो। उस कॉफ़ी के कप से उठती भाप में, बारिश की ठंडी हवा में, और उस अधूरी मुस्कान में ... मैं अपनी पूरी ज़िंदगी देख रहा था।

बारिश और तेज़ हुई। उसने कॉफ़ी का आख़िरी घूंट लिया, कप मेरी ओर बढ़ाया और फुसफुसाकर बोली...“तुम्हारी कॉफ़ी अब भी वैसी ही है… बस मैं थोड़ी बदल गई हूँ।” 

और अगले ही पल, वो चली गई। बालकनी में बस खाली कप रह गया, और मैं…बरसती बूंदों में घुली उसकी यादें पीता रह गया।

~दीपक

Friday, 1 August 2025

"कुछ सवाल अधूरे, कुछ खामोश जवाब"



"मिलोगे?"
एक सीधा-सा सवाल था वो, पर उसके पीछे एक इंतज़ार था, एक चाह थी, और शायद एक आखिरी उम्मीद भी।

चिराग़ ने ये सवाल इसलिए नहीं पूछा था कि उन्हें जवाब चाहिए था, बल्कि इसलिए पूछा था कि शायद इस बार जवाब कुछ और हो… शायद इस बार सामने वाला कह दे, "हां, मिलते हैं।"

लेकिन दिव्या का जवाब सीधा था ...
हर बार मना करने के बाद भी आप क्यों पूछते हैं मुझसे?
उसके शब्दों में झुंझलाहट नहीं थी, लेकिन एक उलझन थी कि जब न मिलना तय हो गया है, तो फिर मिलने की बात क्यों?

चिराग़ ने बस "ओके" कहकर बात खत्म करनी चाही, पर दिव्या फिर खुद ही पूछ बैठी –
"क्या ओके... मैं बस पूछ रही थी।"

उसने भी शायद दिल से समझा कि चिराग़ का सवाल यूँ ही नहीं था। लेकिन चिराग़ जान चुका था कि अब इस सवाल के जवाब में वही पुराना सन्नाटा मिलेगा। इसलिए उसने खुद से कहा “इसके पीछे का कारण शायद मैं समझ नहीं पाऊं।

और फिर अगली सुबह ...
एक लंबा, भावनाओं से भरा संदेश, जो चिराग़ ने दिल से लिखा ...
Don’t worry… ये आखिरी बार था।
शायद तुम कहीं ज्यादा व्यस्त हो, या शायद अब तुम्हारे मन में मेरे लिए पहले जैसा कुछ भी नहीं रहा। मैंने कोशिश की, क्योंकि ये रिश्ता मेरे लिए मायने रखता है। लेकिन अब मैं तुम्हें स्पेस देता हूं… क्योंकि बार-बार दरवाज़ा खटखटाना तब ठीक नहीं होता जब सामने वाला दरवाज़ा खोलना ही नहीं चाहता।
ख़्याल रखना।”

ये शब्द सिर्फ विदाई नहीं थे, ये एक थके हुए दिल की आखिरी आवाज़ थी। लेकिन कहानी का मोड़ वहीं से शुरू हुआ।
दिव्या का जवाब आया ...
 “मैंने सच में बहुत कोशिश की आपको भुला दूं… लेकिन कहीं न कहीं वो चीज़ हमेशा रहती है अंदर। I do miss you always 🙂”

"याद आती है आपकी बहुत..."

ये वो भावनाएं थीं, जो शायद बहुत पहले कही जानी चाहिए थीं, लेकिन किसी द्वंद्व, किसी उलझन, या ईगो के आगे दब गईं थीं। अब जब चिराग़ ने पीछे हट रहा था .... शायद दिव्या को महसूस हुआ हो कि जो पीछे खड़ा था हमेशा ...हर बार मिलने के बहाने खोजता था ...अब शायद वो चला जाएगा।

चिराग़ का जवाब भी एकदम सच्चा था ...
"Same here 😔"

दोनों ने एक-दूसरे को मिस किया, एक-दूसरे की यादों में जिया, लेकिन मुलाक़ात नहीं हो पाई।

यह कहानी उन रिश्तों की है...
जहां लोग एक-दूसरे से बेहद जुड़े होते हैं,
लेकिन समय, हालात, या शायद कुछ न कहा गया डर; उन्हें दूर कर देता है।
जहां प्यार तो होता है, लेकिन साथ नहीं। जहां बातों से ज़्यादा ख़ामोशियां बोलती हैं, और कभी-कभी सबसे गहरी बातें वहीं छुपी होती हैं, जहां दो शब्द भी कहे नहीं जाते।

शायद किसी और जन्म में,
किसी और वक़्त में,
किसी और मोड़ पर
ये अधूरी कहानी पूरी हो।

पर फिलहाल, यही सच्चाई है –
"कभी-कभी हम सबसे ज़्यादा उन्हीं को याद करते हैं,
जिनसे मिलना अब मुमकिन नहीं होता।"
~दीपक