ऐसे कई सारे फूल हैं जो मुझे आकर्षित कर रहे हैं । लेकिन पास जाने पर मुझे मनचाही खुशबू नहीं मिल रही नहीं । कुछ फूल नए हैं तो कुछ पुराने । मैं अपनी बालकनी को गुलजार तो देखना चाहता हूं लेकिन एक साथ ढेर सारा नयापन मैं संभाल नहीं पाता और पुराने फूलों में अब वो खुशबू नहीं रह गई है।
मैं सपने देखता हूं एक ऐसे फूल की जिसे मैं देर तक निहार सकूं जिसकी सुंदरता ढल जाने के बाद भी उसकी पंखुड़ियों को अपने पसंदीदा किताब के पन्नों के बीच सहेज कर रख सकूं । कभी कभी मैं आत्मसंदेह की स्थिति से भर जाता हूं । कई बार फूलों के प्रति अपने आकर्षण से मै लड़ता भी हूं । अपनी खुशियों के इतने सापेक्षिक होने पर मुझे चिढ़ होने लगी है....
~दीपक