Saturday, 5 July 2025

कितनी सारी बातें रह गई....

चाचा को गए लगभग साल भर हो गए । पिछले कुछ दिनों से उनकी स्मृति एकाएक उभर सी आई है । मन हर बार उसी अमरूद के पेड़ के नीचे जा रहा जहां गर्मी के दिनों में दोपहरी और शाम में चाचा किताब पढ़ते मिल जाते थे । उनकी याद आते ही एक अजीब सा अधूरापन सा महसूस होता है । लगता है कितना कुछ साथ जिया जाना अभी रह गया था । 
हमारी कभी फोन पर बात नहीं होती थी लेकिन जब भी घर जाता, उन्हें एक किताब का इंतजार ज़रूर रहता था । मैं अक्सर सोचता था एक दिन अपनी लिखी कोई किताब जब इन्हें दूंगा तो कितना अच्छा लगेगा । 
 कितनी सारी बातें रह गई । यह सब लिखते हुए बार बार मै अजीब सी पीड़ा अनुभव कर रहा हूं । किसी के चले जाने के बाद ही इतना सब अनुभव क्यों होता है । किसी अपने को अलविदा कह पाना बहुत कठिन है । शायद समय का सबसे बड़ा छल यही है कि वह हमें ये कभी नहीं बताता कि कौन सी मुलाकात आख़िरी है ।
~दीपक